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Rigveda Mandal 1 / Sukta 129 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/129/8
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- स्वराट्शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रप्रा॑ वो अ॒स्मे स्वय॑शोभिरू॒ती प॑रिव॒र्ग इन्द्रो॑ दुर्मती॒नां दरी॑मन्दुर्मती॒नाम्। स्व॒यं सा रि॑ष॒यध्यै॒ या न॑ उपे॒षे अ॒त्रैः। ह॒तेम॑स॒न्न व॑क्षति क्षि॒प्ता जू॒र्णिर्न व॑क्षति ॥

प्रऽप्र॑ । वः॒ । अ॒स्मे इति॑ । स्वय॑शःऽभिः । ऊ॒ती । प॒रि॒ऽव॒र्गे । इन्द्रः॑ । दुः॒ऽम॒ती॒नाम् । दरी॑मन् । दुः॒ऽम॒ती॒नाम् । स्व॒यम् । सा । रि॒ष॒यध्यै॒ । या । नः॒ । उ॒प॒ऽई॒षे । अ॒त्रैः । ह॒ता । ई॒म् । अ॒स॒त् । न । व॒क्ष॒ति॒ । क्षि॒प्ता । जू॒र्णिः । न । व॒क्ष॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
प्रप्रा वो अस्मे स्वयशोभिरूती परिवर्ग इन्द्रो दुर्मतीनां दरीमन्दुर्मतीनाम्। स्वयं सा रिषयध्यै या न उपेषे अत्रैः। हतेमसन्न वक्षति क्षिप्ता जूर्णिर्न वक्षति ॥

प्रऽप्र। वः। अस्मे इति। स्वयशःऽभिः। ऊती। परिऽवर्गे। इन्द्रः। दुःऽमतीनाम्। दरीमन्। दुःऽमतीनाम्। स्वयम्। सा। रिषयध्यै। या। नः। उपऽईषे। अत्रैः। हता। ईम्। असत्। न। वक्षति। क्षिप्ता। जूर्णिः। न। वक्षति ॥ १.१२९.८

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मित्रो ! (वः) तुम लोगों के लिये (अस्मे) और हमारे लिये (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् विद्वान् (दुर्मतीनाम्) दुष्ट बुद्धिवाले दुष्ट मनुष्यों के (परिवर्गे) सब ओर से सम्बन्ध में और (दुर्मतीनाम्) दुष्ट बुद्धिवाले दुराचारी मनुष्यों के (दरीमन्) अतिशय कर विदारने में (स्वयशोभिः) अपनी प्रशंसाओं और (ऊती) रक्षा से (प्रप्र, वक्ष्यति) उत्तमता से उपदेश करे (या) जो सेना (नः) हम लोगों के (उपेषे) समीप आने के लिये (अत्रैः) आततायी शत्रुजनों ने (क्षिप्ता) प्रेरित की अर्थात् पठाई हो (सा) वह (रिषयध्यै) दूसरों को हनन कराने के लिये प्रवृत्त हुई (स्वयम्) आप (ईम्) सब ओर से (हता) नष्ट (असत्) हो किन्तु वह (जूर्णिः) शीघ्रता करनेवाली के (न) समान (न)(वक्षति) प्राप्त हो अर्थात् शीघ्रता करने ही न पावे किन्तु तावत् नष्ट हो जावे ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो दुष्टों के सङ्ग को छोड़ सत्सङ्ग से कीर्त्तिमान् होकर अतीव प्रशंसित सेना से प्रजा की रक्षा करते हैं, वे उत्तम ऐश्वर्य्यवाले होते हैं ॥ ८ ॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करके कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।