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Rigveda Mandal 1 / Sukta 129 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/129/7
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- स्वराडतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व॒नेम॒ तद्धोत्र॑या चि॒तन्त्या॑ व॒नेम॑ र॒यिं र॑यिवः सु॒वीर्यं॑ र॒ण्वं सन्तं॑ सु॒वीर्य॑म्। दु॒र्मन्मा॑नं सु॒मन्तु॑भि॒रेमि॒षा पृ॑चीमहि। आ स॒त्याभि॒रिन्द्रं॑ द्यु॒म्नहू॑तिभि॒र्यज॑त्रं द्यु॒म्नहू॑तिभिः ॥

व॒नेम॑ । तत् । होत्र॑या । चि॒तन्त्या॑ । व॒नेम॑ । र॒यिम् । र॒यि॒ऽवः॒ । सु॒ऽवीर्य॑म् । र॒ण्वम् । सन्त॑म् । सु॒ऽवीर्य॑म् । दुः॒ऽमन्मा॑नम् । सु॒मन्तु॑ऽभिः । आ । ई॒म् । इ॒षा । पृ॒ची॒म॒हि॒ । आ । स॒त्याभिः॑ । इन्द्र॑म् । द्यु॒म्नहू॑तिऽभिः । यज॑त्रम् । द्यु॒म्नहू॑तिऽभिः ॥

Mantra without Swara
वनेम तद्धोत्रया चितन्त्या वनेम रयिं रयिवः सुवीर्यं रण्वं सन्तं सुवीर्यम्। दुर्मन्मानं सुमन्तुभिरेमिषा पृचीमहि। आ सत्याभिरिन्द्रं द्युम्नहूतिभिर्यजत्रं द्युम्नहूतिभिः ॥

वनेम। तत्। होत्रया। चितन्त्या। वनेम। रयिम्। रयिऽवः। सुऽवीर्यम्। रण्वम्। सन्तम्। सुऽवीर्यम्। दुःऽमन्मानम्। सुमन्तुऽभिः। आ। ईम्। इषा। पृचीमहि। आ। सत्याभिः। इन्द्रम्। द्युम्नहूतिऽभिः। यजत्रम्। द्युम्नहूतिऽभिः ॥ १.१२९.७

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (रयिवः) धनवान् ! जैसे हम लोग (होत्रया) ग्रहण करने योग्य (चितन्त्या) चेतानेवाली बुद्धिमती (=बुद्धिमानी) से जिस ज्ञान का (वनेम) अच्छे प्रकार सेवन करें वा (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ पराक्रमयुक्त (रयिम्) धन तथा (सन्तम्) वर्त्तमान (रण्वम्) उपदेश करनेवाले (सुवीर्य्यम्) विद्या और धर्म से उत्तम आत्मा के बल का (वनेम) सेवन करें वा (सुमन्तुभिः) उत्तम विद्यायुक्त पुरुषों और (ईम्) पाने योग्य (इषा) इच्छा से (दुर्मन्मानम्) दुष्ट जन मान करनेहारे को जो मारनेवाला उसका (आ, पृचीमहि) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करें तथा (द्युम्नहूतिभिः) धन वा यश की बातचीतों से (यजत्रम्) अच्छे प्रकार सङ्ग करने योग्य व्यवहार के समान (सत्याभिः) सत्य आचरणयुक्त (द्युम्नहूतिभिः) धनविषयक बातों से (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य का (आ) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करें वैसे (तत्) उक्त समस्त व्यवहार को आप भजो और उससे सम्बन्ध करो ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। माता और पिता आदि को वा विद्वानों को चाहिये कि अपने सन्तानों को इस प्रकार उपदेश करें कि जो हमारे धर्म के अनुकूल काम हैं, वे आचरण करने योग्य किन्तु और काम आचरण करने योग्य नहीं, ऐसे सत्याचरणों और परोपकार से निरन्तर ऐश्वर्य्य की उन्नति करनी चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर माता आदि को सन्तान कैसे उपदेशों से समझाने चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।