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Rigveda Mandal 1 / Sukta 129 / Mantra 6

191 Sukta
11 Mantra
1/129/6
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र तद्वो॑चेयं॒ भव्या॒येन्द॑वे॒ हव्यो॒ न य इ॒षवा॒न्मन्म॒ रेज॑ति रक्षो॒हा मन्म॒ रेज॑ति। स्व॒यं सो अ॒स्मदा नि॒दो व॒धैर॑जेत दुर्म॒तिम्। अव॑ स्रवेद॒घशं॑सोऽवत॒रमव॑ क्षु॒द्रमि॑व स्रवेत् ॥

प्र । तत् । वो॒चे॒य॒म् । भव्या॑य । इन्द॑वे । हव्यः॑ । न । यः । इ॒षऽवा॑न् । मन्म॑ । रेज॑ति । र॒क्षः॒ऽहा । मन्म॑ । रेज॑ति । स्व॒यम् । सः । अ॒स्मत् । आ । नि॒दः । व॒धैः । अ॒जे॒त॒ । दुःऽम॒तिम् । अव॑ । स्र॒वे॒त् । अ॒घऽशं॑सः । अ॒व॒ऽत॒रम् । अव॑ । क्षु॒द्रम्ऽइ॑व । स्र॒वे॒त् ॥

Mantra without Swara
प्र तद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य इषवान्मन्म रेजति रक्षोहा मन्म रेजति। स्वयं सो अस्मदा निदो वधैरजेत दुर्मतिम्। अव स्रवेदघशंसोऽवतरमव क्षुद्रमिव स्रवेत् ॥

प्र। तत्। वोचेयम्। भव्याय। इन्दवे। हव्यः। न। यः। इषऽवान्। मन्म। रेजति। रक्षःऽहा। मन्म। रेजति। स्वयम्। सः। अस्मत्। आ। निदः। वधैः। अजेत। दुःऽमतिम्। अव। स्रवेत्। अघऽशंसः। अवऽतरम्। अव। क्षुद्रम्ऽइव। स्रवेत् ॥ १.१२९.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
मैं (स्वयम्) आप जैसे (हव्यः) स्वीकार करने योग्य (रक्षोहा) दुष्ट गुण, कर्म, स्वभाववालों को मारनेवाला (मन्म) विचार करने योग्य ज्ञान का (रेजति) संग्रह करते हुए के (न) समान (यः) जो (इषवान्) ज्ञानवान् (मन्म) जानने योग्य व्यवहार को (रेजति) संग्रह करता है (तत्) उस उपदेश करने योग्य ज्ञान को (भव्याय) जो विद्याग्रहण की इच्छा करनेवाला होता है उस (इन्दवे) आर्द्र अर्थात् कोमल हृदयवाले के लिये (प्र, वोचेयम्) उत्तमता से कहूँ जो (अस्मत्) हमसे शिक्षा पाकर (वधैः) मारने के उपायों से (निदः) निन्दा करनेहारों और (दुर्मतिम्) दुष्टमतिवाले जन को (अजेत) दूर करे (सः) वह (अवतरम्) अधोमुखी लज्जित मुखवाले पुरुष को (क्षुद्रमिव) तुच्छ आशयवाले के समान (अव, स्रवेत्) उसके स्वभाव से विपरीत दण्ड देवे और (अघशंसः) जो पाप की प्रशंसा करता वह चोर, डाँकू, लम्पट, लबाड़ आदि जन (अव, आ, स्रवेत्) अपने स्वभाव से अच्छे प्रकार उलटी चाल चले ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। अध्यापक विद्वान् जो शुभ गुण, कर्म, स्वभाववाले विद्यार्थी हैं, उनके लिये प्रीति से विद्याओं को देवे और निन्दा करनेहारे चोरों को निकाल देवे और आप भी सदैव धर्मात्मा हो ॥ ६ ॥
Subject
किनके लिये विद्या देनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।