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Rigveda Mandal 1 / Sukta 129 / Mantra 11

191 Sukta
11 Mantra
1/129/11
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पा॒हि न॑ इन्द्र सुष्टुत स्रि॒धो॑ऽवया॒ता सद॒मिद्दु॑र्मती॒नां दे॒वः सन्दु॑र्मती॒नाम्। ह॒न्ता पा॒पस्य॑ र॒क्षस॑स्त्रा॒ता विप्र॑स्य॒ माव॑तः। अधा॒ हि त्वा॑ जनि॒ता जीज॑नद्वसो रक्षो॒हणं॑ त्वा॒ जीज॑नद्वसो ॥

पा॒हि । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । सु॒ऽस्तु॒त॒ । स्रि॒धः । अ॒व॒ऽया॒ता । सद॒म् । इत् । दुः॒ऽम॒ती॒नाम् । दे॒वः । सन् । दुः॒ऽम॒ती॒नाम् । ह॒न्ता । पा॒पस्य॑ । र॒क्षसः॑ । त्रा॒ता । विप्र॑स्य । माव॑तः । अध॑ । हि । त्वा॒ । ज॒नि॒ता । जीज॑नत् । व॒सो॒ इति॑ । र॒क्षः॒ऽहन॑म् । त्वा॒ । जीज॑नत् । व॒सो॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
पाहि न इन्द्र सुष्टुत स्रिधोऽवयाता सदमिद्दुर्मतीनां देवः सन्दुर्मतीनाम्। हन्ता पापस्य रक्षसस्त्राता विप्रस्य मावतः। अधा हि त्वा जनिता जीजनद्वसो रक्षोहणं त्वा जीजनद्वसो ॥

पाहि। नः। इन्द्र। सुऽस्तुत। स्रिधः। अवऽयाता। सदम्। इत्। दुःऽमतीनाम्। देवः। सन्। दुःऽमतीनाम्। हन्ता। पापस्य। रक्षसः। त्राता। विप्रस्य। मावतः। अध। हि। त्वा। जनिता। जीजनत्। वसो इति। रक्षःऽहनम्। त्वा। जीजनत्। वसो इति ॥ १.१२९.११

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुष्टुत) उत्तम प्रशंसा को प्राप्त (इन्द्र) सभापति ! (अवयाता) विरुद्ध मार्ग को जाते और (देवः) सत्य न्याय की कामना अर्थात् खोज करते (सन्) हुए (दुर्मतीनाम्) दुष्ट मनुष्यों के (सदम्) स्थान के (इत्) समान (दुर्मतीनाम्) दुष्ट बुद्धिवाले मनुष्यों के प्रचार का विनाश कर (स्रिधः) दुःख के हेतु पाप से (नः) हम लोगों को (पाहि) रक्षा करो। हे (वसो) सज्जनों में वसनेहारे (जनिता) उत्पन्न करनेहारा पिता, गुरु जिस (रक्षोहणम्) दुष्टों के नाश करनेहारे (त्वा) आपको (जीजनत्) उत्पन्न करे। वा हे (वसो) विद्याओं में वास अर्थात् प्रवेश करानेहारे ! जिन रक्षा करनेवाले (त्वा) आपको (जीजनत्) उत्पन्न करे सो (हि) ही आप (अथ) इसके अनन्तर (पापस्य) पाप आचरण करनेवाले (रक्षसः) राक्षस अर्थात् औरों को पीड़ा देनेहारे के (हन्ता) मारनेवाले तथा (मावतः) मेरे समान (विप्रस्य) बुद्धिमान् धर्मात्मा पुरुष की (त्राता) रक्षा करनेवाले हूजिये ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यही विद्वानों का प्रशंसा करने योग्य काम है जो पाप का खण्डन और धर्म का मण्डन करना, किसी को दुष्ट का सङ्ग और श्रेष्ठजन का त्याग न करना चाहिये ॥ ११ ॥इस सूक्त में विद्वानों और राजजनों के धर्म का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह एकसौ उनतीसवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।