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Rigveda Mandal 1 / Sukta 128 / Mantra 8

191 Sukta
8 Mantra
1/128/8
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒ग्निं होता॑रमीळते॒ वसु॑धितिं प्रि॒यं चेति॑ष्ठमर॒तिं न्ये॑रिरे हव्य॒वाहं॒ न्ये॑रिरे। वि॒श्वायुं॑ वि॒श्ववे॑दसं॒ होता॑रं यज॒तं क॒विम्। दे॒वासो॑ र॒ण्वमव॑से वसू॒यवो॑ गी॒र्भी र॒ण्वं व॑सू॒यव॑: ॥

अ॒ग्निम् । होता॑रम् । ई॒ळ॒ते॒ । वसु॑ऽधितिम् । प्रि॒यम् । चेति॑ष्ठम् । अ॒र॒तिम् । नि । ए॒रि॒रे॒ । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । नि । ए॒रि॒रे॒ । वि॒श्वऽआ॑युम् । वि॒श्वऽवे॑दसम् । होता॑रम् । य॒ज॒तम् । क॒विम् । दे॒वासः॑ । र॒ण्वम् । अव॑से । व॒सु॒ऽयवः॑ । गीः॒ऽभिः । र॒ण्वम् । व॒सु॒ऽयवः॑ ॥

Mantra without Swara
अग्निं होतारमीळते वसुधितिं प्रियं चेतिष्ठमरतिं न्येरिरे हव्यवाहं न्येरिरे। विश्वायुं विश्ववेदसं होतारं यजतं कविम्। देवासो रण्वमवसे वसूयवो गीर्भी रण्वं वसूयव: ॥

अग्निम्। होतारम्। ईळते। वसुऽधितिम्। प्रियम्। चेतिष्ठम्। अरतिम्। नि। एरिरे। हव्यऽवाहम्। नि। एरिरे। विश्वऽआयुम्। विश्वऽवेदसम्। होतारम्। यजतम्। कविम्। देवासः। रण्वम्। अवसे। वसुऽयवः। गीःऽभिः। रण्वम्। वसुऽयवः ॥ १.१२८.८

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (देवासः) विद्वान् जन जिस (अग्निम्) अग्नि के समान वर्त्तमान (होतारम्) देनेवाले (वसुधितिम्) जिसके कि धनों की धारणा हैं (अरतिम्) और जो विद्या पाये हुए हैं उस (हव्यवाहम्) देने-लेने योग्य व्यवहार की प्राप्ति कराने (चेतिष्ठम्) चिताने और (प्रियम्) प्रीति उत्पन्न करानेहारे विद्वान् के जानने की इच्छा किये हुए (न्येरिरे) निरन्तर प्रेरणा देते वा (विश्वायुम्) जो सब विद्यादि गुणों के बोध को प्राप्त होता (विश्ववेदसम्) जिसका समग्र वेद धन उस (होतारम्) ग्रहण करनेवाले (यजतम्) सत्कार करने योग्य (कविम्) पूर्णविद्यायुक्त और (रण्वम्) सत्योपदेशक सत्यवादी पुरुष को (वसूयवः) जो धन आदि पदार्थों की इच्छा करते हैं उनके समान (न्येरिरे) निरन्तर प्राप्त होते हैं वा जो (वसूयवः) धन आदि पदार्थों को चाहनेवाले (अवसे) रक्षा आदि के लिये (गीर्भिः) अच्छी संस्कार की हुई वाणियों से (रण्वम्) सत्य बोलनेवाले की (ईळते) स्तुति करते हैं, उन सबों की तुम भी स्तुति करो ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! विद्वान् लोग जिसकी सेवा और सङ्ग से विद्यादि गुणों को पाते हैं, उसी की सेवा और सङ्ग से तुम लोगों को चाहिये कि इनको पाओ ॥ ८ ॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ अट्ठाईसवाँ १२८ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
किसके मिलाप से क्या पाने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।