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Rigveda Mandal 1 / Sukta 128 / Mantra 7

191 Sukta
8 Mantra
1/128/7
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स मानु॑षे वृ॒जने॒ शंत॑मो हि॒तो॒३॒॑ऽग्निर्य॒ज्ञेषु॒ जेन्यो॒ न वि॒श्पति॑: प्रि॒यो य॒ज्ञेषु॑ वि॒श्पति॑:। स ह॒व्या मानु॑षाणामि॒ळा कृ॒तानि॑ पत्यते। स न॑स्त्रासते॒ वरु॑णस्य धू॒र्तेर्म॒हो दे॒वस्य॑ धू॒र्तेः ॥

सः । मानु॑षे । वृ॒जने॑ । शम्ऽत॑मः । हि॒तः । अ॒ग्निः । य॒ज्ञेषु॑ । जेन्यः॑ । न । वि॒श्पतिः॑ । प्रि॒यः । य॒ज्ञेषु॑ । वि॒श्पति॑ह् । सः । ह॒व्या । मानु॑षाणाम् । इ॒ळा । कृ॒तानि॑ । प॒त्य॒ते॒ । सः । नः॒ । त्रा॒स॒ते॒ । वरु॑णस्य । धू॒र्तेः । म॒हः । दे॒वस्य॑ । धू॒र्तेः ॥

Mantra without Swara
स मानुषे वृजने शंतमो हितो३ऽग्निर्यज्ञेषु जेन्यो न विश्पति: प्रियो यज्ञेषु विश्पति:। स हव्या मानुषाणामिळा कृतानि पत्यते। स नस्त्रासते वरुणस्य धूर्तेर्महो देवस्य धूर्तेः ॥

सः। मानुषे। वृजने। शम्ऽतमः। हितः। अग्निः। यज्ञेषु। जेन्यः। न। विश्पतिः। प्रियः। यज्ञेषु। विश्पतिः। सः। हव्या। मानुषाणाम्। इळा। कृतानि। पत्यते। सः। नः। त्रासते। वरुणस्य। धूर्तेः। महः। देवस्य। धूर्तेः ॥ १.१२८.७

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (प्रियः) तृप्ति करनेवाला है वह (विश्पतिः) प्रजाओं का पालक राजा (नः) हम लोगों को (धूर्त्तेः) हिंसक से (त्रासते) वेमन कराता और (सः) वह (धूर्त्तेः) अविद्या को नाशने और (महः) बड़े (देवस्य) विद्या देनेवाले (वरुणस्य) उत्तम विद्वान् के पास से जो (यज्ञेषु) सङ्ग करने योग्य व्यवहारों में (मानुषाणाम्) मनुष्यों के (इळा) अच्छे संस्कारों से युक्त (कृतानि) सिद्ध किये शुद्ध वचन (हव्या) जो कि ग्रहण करने योग्य हों उनको स्थिर करता तथा (सः) वह सबको (पत्यते) प्राप्त होता वा (यज्ञेषु) अग्निहोत्र आदि यज्ञों में (अग्निः) अग्नि के समान वा (जेन्यः) विजयशील के (न) समान (विश्पतिः) प्रजाजनों का पालनेवाला (मानुषे) मनुष्यों के (वृजने) उस मार्ग में कि जिसमें गमन करते (हितः) हित सिद्ध करनेवाला (शंतमः) अतीव सुखकारी होता (सः) वह विद्वान् सबको सत्कार करने योग्य होता है ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धर्म मार्ग में मनुष्यों को उपदेश से प्रवृत्त कराते, न्यायाधीश राजा के समान प्रजाजनों को पालने, डाँकू आदि दुष्ट प्राणियों से जो डर उसको निवृत्त करानेवाले विद्वानों के मित्रजन हैं, वे ही अन्धपरम्परा अर्थात् कुमार्ग के रोकनेवाले होने को योग्य होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर वे क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।