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Rigveda Mandal 1 / Sukta 128 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/128/6
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
विश्वो॒ विहा॑या अर॒तिर्वसु॑र्दधे॒ हस्ते॒ दक्षि॑णे त॒रणि॒र्न शि॑श्रथच्छ्रव॒स्यया॒ न शि॑श्रथत्। विश्व॑स्मा॒ इदि॑षुध्य॒ते दे॑व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑षे। विश्व॑स्मा॒ इत्सु॒कृते॒ वार॑मृण्वत्य॒ग्निर्द्वारा॒ व्यृ॑ण्वति ॥

विश्वः॑ । विऽहा॑याः । अ॒र॒तिः । वसुः॑ । द॒धे॒ । हस्ते॑ । दक्षि॑णे । त॒रणिः॑ । न । शि॒श्र॒थ॒त् । श्र॒व॒स्यया॑ । न । शि॒श्र॒थ॒त् । विश्व॑स्मै॒ । इत् । इ॒षु॒ध्य॒ते । दे॒व॒ऽत्रा । ह॒व्यम् । आ । ऊ॒हि॒षे॒ । विश्व॑स्मै । इत् । सु॒ऽकृते॑ । वार॑म् । ऋ॒ण्व॒ति॒ । अ॒ग्निः । द्वारा॑ । वि । ऋ॒ण्व॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
विश्वो विहाया अरतिर्वसुर्दधे हस्ते दक्षिणे तरणिर्न शिश्रथच्छ्रवस्यया न शिश्रथत्। विश्वस्मा इदिषुध्यते देवत्रा हव्यमोहिषे। विश्वस्मा इत्सुकृते वारमृण्वत्यग्निर्द्वारा व्यृण्वति ॥

विश्वः। विऽहायाः। अरतिः। वसुः। दधे। हस्ते। दक्षिणे। तरणिः। न। शिश्रथत्। श्रवस्यया। न। शिश्रथत्। विश्वस्मै। इत्। इषुध्यते। देवऽत्रा। हव्यम्। आ। ऊहिषे। विश्वस्मै। इत्। सुऽकृते। वारम्। ऋण्वति। अग्निः। द्वारा। वि। ऋण्वति ॥ १.१२८.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(विश्वः) समग्र (विहायाः) विद्या आदि शुभगुणों में व्याप्त (अरतिः) उत्तम व्यवहारों की प्राप्ति कराता और (तरणिः) तारनेहारा (वसुः) प्रथम श्रेणी का ब्रह्मचारी विद्वान् (श्रवस्यया) अपनी उत्तम उपदेश सुनने की इच्छा से जैसे (अग्निः) बिजुली न (शिश्रथत्) शिथिल हो वैसे (न) नहीं (शिश्रथत्) शिथिल हो वा (दक्षिणे) दाहिने (हस्ते) हाथ में जैसे आमलक धरें वैसे (देवत्रा) विद्वानों में मैं विद्या को (दधे) धारण करूँ वा (विश्वस्मै) सब (इषुध्यते) धनुष् के समान आचरण करते हुए जनसमूह के लिये तूँ (हव्यम्) देने योग्य पदार्थ का (आ, ऊहिषे) तर्क-वितर्क करता (इत्) वैसे ही जो (विश्वस्मै) सब (सुकृते) सुकर्म करनेवाले जनसमूह के लिये (द्वारा) उत्तम व्यवहारों के द्वारों को (ऋण्वति) प्राप्त होता वह सुख (इत्) ही के (वारम्) स्वीकार करने को (वि, ऋण्वति) विशेषता से प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य सब व्यक्त पदार्थों को प्रकाशित कर सबके लिये सब सुखों को उत्पन्न करता, वैसे हिंसा आदि दोषों से रहित विद्वान् जन विद्या का प्रकाश कर सबको आनन्दित करते हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।