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Rigveda Mandal 1 / Sukta 128 / Mantra 5

191 Sukta
8 Mantra
1/128/5
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
क्रत्वा॒ यद॑स्य॒ तवि॑षीषु पृ॒ञ्चते॒ऽग्नेरवे॑ण म॒रुतां॒ न भो॒ज्ये॑षि॒राय॒ न भो॒ज्या॑। स हि ष्मा॒ दान॒मिन्व॑ति॒ वसू॑नां च म॒ज्मना॑। स न॑स्त्रासते दुरि॒ताद॑भि॒ह्रुत॒: शंसा॑द॒घाद॑भि॒ह्रुत॑: ॥

क्रत्वा॑ । यत् । अ॒स्य॒ । तवि॑षीषु । पृ॒ञ्चते॑ । अ॒ग्नेः । अवे॑न । म॒रुता॒म् । न । भो॒ज्या॑ । इ॒षि॒राय । न । भो॒ज्या॑ । सः । हि । स्म॒ । दान॑म् । इन्व॑ति । वसू॑नाम् । च॒ । म॒ज्मना॑ । सः । नः॒ । त्रा॒स॒ते॒ । दुः॒ऽइ॒तात् । अ॒भि॒ऽह्रुतः॑ । शंसा॑त् । अ॒घात् । अ॒भि॒ऽह्रुतः॑ ॥

Mantra without Swara
क्रत्वा यदस्य तविषीषु पृञ्चतेऽग्नेरवेण मरुतां न भोज्येषिराय न भोज्या। स हि ष्मा दानमिन्वति वसूनां च मज्मना। स नस्त्रासते दुरितादभिह्रुत: शंसादघादभिह्रुत: ॥

क्रत्वा। यत्। अस्य। तविषीषु। पृञ्चते। अग्नेः। अवेन। मरुताम्। न। भोज्या। इषिराय। न। भोज्या। सः। हि। स्म। दानम्। इन्वति। वसूनाम्। च। मज्मना। सः। नः। त्रासते। दुःऽइतात्। अभिऽह्रुतः। शंसात्। अघात्। अभिऽह्रुतः ॥ १.१२८.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 5

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Meaning
(यत्) जो (अस्य) इस सेनापति की (क्रत्वा) बुद्धि और (अवेन) रक्षा आदि काम से (मरुताम्) पवनों और (अग्नेः) बिजुली आग की (इषिराय) विद्या को प्राप्त हुए पुरुष के लिये (भोज्या) भोजन करने योग्य पदार्थों के (न) समान वा (भोज्या) पालने योग्य पदार्थों के (न) समान पदार्थों का (तविषीषु) प्रशंसित बलयुक्त सेनाओं में (पृञ्चते) सम्बन्ध करता वा जो (हि) ठीक-ठीक (मज्मना) बल से (वसूनाम्) प्रथम कक्षावाले विद्वानों तथा (च) पृथिव्यादि लोकों का (दानम्) जो दिया जाता पदार्थ उसको (इन्वति) प्राप्ति होता वा जो (नः) हम लोगों को (अभिह्रुतः) क्षागे आये हुए कुटिल (दुरितात्) दुःखदायी (अभिह्रुतः) सब ओर से टेढ़े-मेढ़े छोटे-बड़े (अघात्) पाप से (त्रासते) उद्वेग करता अर्थात् उठाता वा (शंसात्) प्रशंसा से संयोग कराता (सः, स्म) वही सुख को प्राप्त होता और (सः) वह सुख करनेवाला होता तथा वही विद्वान् सबके सत्कार करने योग्य और वह सभों की ओर से रक्षा करनेहारा होता है ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो उत्तम शिक्षा और विद्या के दान से दुष्टस्वभावी प्राणियों और अधर्म के आचरणों से निवृत्त कराके अच्छे गुणों में प्रवृत्त कराते, वे इस संसार में कल्याण करनेवाले धर्मात्मा विद्वान् होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
इस संसार में उत्तम सुख का विधान करनेवाले कौन होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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