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Rigveda Mandal 1 / Sukta 128 / Mantra 4

191 Sukta
8 Mantra
1/128/4
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स सु॒क्रतु॑: पु॒रोहि॑तो॒ दमे॑दमे॒ऽग्निर्य॒ज्ञस्या॑ध्व॒रस्य॑ चेतति॒ क्रत्वा॑ य॒ज्ञस्य॑ चेतति। क्रत्वा॑ वे॒धा इ॑षूय॒ते विश्वा॑ जा॒तानि॑ पस्पशे। यतो॑ घृत॒श्रीरति॑थि॒रजा॑यत॒ वह्नि॑र्वे॒धा अजा॑यत ॥

सः । सु॒ऽक्रतुः॑ । पु॒रःऽहि॑तः॑ । दमे॑ऽदमे । अ॒ग्निः । य॒ज्ञस्य । अ॒ध्व॒रस्य॑ । चे॒त॒ति॒ । क्रत्वा॑ । य॒ज्ञस्य॑ । चे॒त॒ति॒ । क्रत्वा॑ । वे॒धाः । इ॒षु॒ऽय॒ते । विश्वा॑ । जा॒तानि॑ । प॒स्प॒शे॒ । यतः॑ । घृ॒त॒ऽश्रीः । अति॑थिः । अजा॑यत । वह्निः॑ । वे॒धाः । अजा॑यत ॥

Mantra without Swara
स सुक्रतु: पुरोहितो दमेदमेऽग्निर्यज्ञस्याध्वरस्य चेतति क्रत्वा यज्ञस्य चेतति। क्रत्वा वेधा इषूयते विश्वा जातानि पस्पशे। यतो घृतश्रीरतिथिरजायत वह्निर्वेधा अजायत ॥

सः। सुऽक्रतुः। पुरःऽहितः। दमेऽदमे। अग्निः। यज्ञस्य। अध्वरस्य। चेतति। क्रत्वा। यज्ञस्य। चेतति। क्रत्वा। वेधाः। इषुऽयते। विश्वा। जातानि। पस्पशे। यतः। घृतऽश्रीः। अतिथिः। अजायत। वह्निः। वेधाः। अजायत ॥ १.१२८.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सुक्रतुः) उत्तम बुद्धि और कर्मवाला (पुरोहितः) प्रथम जिसने हित सिद्ध किया और (अग्निः) आग के समान प्रतापी वर्त्तमान (दमे दमे) घर-घर में (क्रत्वा) उत्तम बुद्धि वा कर्म से (यज्ञस्य) विद्वानों के सत्काररूप कर्म की (चेतति) अच्छी चितौनी देते हुए के समान (अध्वस्य) न छोड़ने (यज्ञस्य) किन्तु सङ्ग करने योग्य उत्तम यज्ञ आदि काम का (चेतति) विज्ञान कराता वा जो (क्रत्वा) श्रेष्ठ बुद्धि वा कर्म से (वेधाः) धीर बुद्धिवाला (इषूयते) वाण के समान विषयों में प्रवेश करता और (विश्वा) समस्त (जातानि) उत्पन्न हुए पदार्थों का (पस्पशे) प्रबन्ध करता वा (यतः) जिससे (घृतश्रीः) घी का सेवन करता हुआ (अतिथिः) जिसकी कोई कहीं ठहरने की तिथि निश्चित नहीं वह सत्कार के योग्य विद्वान् (अजायत) प्रसिद्ध होवे और (वह्निः) वस्तु के गुणादिकों की प्राप्ति करानेवाले अग्नि के समान (वेधाः) धीर बुद्धि पुरुष (अजायत) प्रसिद्ध होवे (सः) वही विद्वान् विद्या के उपदेश के लिये सबको अच्छे प्रकार आश्रय करने योग्य है ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् देश-देश, नगर-नगर, द्वीप-द्वीप, गाँव-गाँव, घर-घर में सत्य का उपदेश करते, वे सबको सत्कार करने योग्य होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर कौन विद्वान् सत्कार के योग्य होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।