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Rigveda Mandal 1 / Sukta 127 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/127/7
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
द्वि॒ता यदीं॑ की॒स्तासो॑ अ॒भिद्य॑वो नम॒स्यन्त॑ उप॒वोच॑न्त॒ भृग॑वो म॒थ्नन्तो॑ दा॒शा भृग॑वः। अ॒ग्निरी॑शे॒ वसू॑नां॒ शुचि॒र्यो ध॒र्णिरे॑षाम्। प्रि॒याँ अ॑पि॒धीँर्व॑निषीष्ट॒ मेधि॑र॒ आ व॑निषीष्ट॒ मेधि॑रः ॥

द्वि॒ता । यत् । ई॒म् । की॒स्तासः॑ । अ॒भिऽद्य॑वः । न॒म॒स्यन्तः॑ । उ॒प॒ऽवोच॑न्त । भृग॑वः । म॒श्नन्तः॑ । दा॒शा । भृग॑वः । अ॒ग्निः । ई॒शे॒ । वसू॑नाम् । शुचिः॑ । यः । ध॒र्णिः । ए॒षा॒म् । प्रि॒यान् । अ॒पि॒ऽधीन् । व॒नि॒षी॒ष्ट॒ । मेधि॑रः । आ । व॒नि॒षी॒श्ट॒ । मेधि॑रः ॥

Mantra without Swara
द्विता यदीं कीस्तासो अभिद्यवो नमस्यन्त उपवोचन्त भृगवो मथ्नन्तो दाशा भृगवः। अग्निरीशे वसूनां शुचिर्यो धर्णिरेषाम्। प्रियाँ अपिधीँर्वनिषीष्ट मेधिर आ वनिषीष्ट मेधिरः ॥

द्विता। यत्। ईम्। कीस्तासः। अभिऽद्यवः। नमस्यन्तः। उपऽवोचन्त। भृगवः। मथ्नन्तः। दाशा। भृगवः। अग्निः। ईशे। वसूनाम्। शुचिः। यः। धर्णिः। एषाम्। प्रियान्। अपिऽधीन्। वनिषीष्ट। मेधिरः। आ। वनिषीष्ट। मेधिरः ॥ १.१२७.७

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (कीस्तासः) उत्तम बुद्धिवाले विद्वान् (अभिद्यवः) जिनके आगे विद्या आदि गुणों के प्रकाश (नमस्यन्तः) जो धर्म का सेवन (भृगवः) तथा अविद्या और अधर्म के नाश करते ज्ञान को (मथ्नन्तः) मथते हुए (भृगवः) और दुःख मिटाते हैं, वे (दाशा) विद्या दान के लिये विद्यार्थियों को (द्विता) जैसे दो का होना हो वैसे अर्थात् एक पर एक (ईम्) सम्मुख प्राप्त हुई विद्या (उपवोचन्त) और गुण का उपदेश करे वा जैसे (एषाम्) इन (वसूनाम्) पृथिवी आदि लोकों के बीच (यः) जो (धर्णिः) शिल्पविद्या विषयक कामों का धारण करनेहारा (शुचिः) पवित्र और दूसरों को युद्ध करनेहारा (अग्निः) अग्नि है वा जैसे (मेधिरः) उत्तम बुद्धिवाला (प्रियान्) प्रसन्नचित्त और (अपिधीन्) श्रेष्ठ गुणों का धारण करने और दुःखों को ढाँपनेवाले विद्वानों को (वनिषीष्ट) याचे अर्थात् उनसे किसी पदार्थ को माँगे वा (मेधिरः) सङ्ग करनेवाला पुरुष देनेवालों को (आ, वनिषीष्ट) अच्छे प्रकार याचे वा विद्या की (ईशे) ईश्वरता प्रकट करे अर्थात् विद्या के अधिकार को प्रकाशित करे, वैसे ही तुम उक्त विद्वान् और अग्नि आदि पदार्थों का सेवन करो ॥ ७ ॥
Essence
जो विद्यार्थी विद्वानों से नित्य विद्या माँगे, उनके लिये विद्वान् भी नित्य ही विद्या को अच्छे प्रकार देवें, क्योंकि इस देने-लेने के तुल्य कुछ भी उत्तम काम नहीं है ॥ ७ ॥
Subject
अब पढ़ाने-पढ़ने वाले कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।