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Rigveda Mandal 1 / Sukta 127 / Mantra 6

191 Sukta
11 Mantra
1/127/6
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स हि शर्धो॒ न मारु॑तं तुवि॒ष्वणि॒रप्न॑स्वतीषू॒र्वरा॑स्वि॒ष्टनि॒रार्त॑नास्वि॒ष्टनि॑:। आद॑द्ध॒व्यान्या॑द॒दिर्य॒ज्ञस्य॑ के॒तुर॒र्हणा॑। अध॑ स्मास्य॒ हर्ष॑तो॒ हृषी॑वतो॒ विश्वे॑ जुषन्त॒ पन्थां॒ नर॑: शु॒भे न पन्था॑म् ॥

सः । हि । शर्धः॑ । न । मारु॑तम् । तु॒वि॒ऽस्वणिः॑ । अप्न॑स्वतीषु । उ॒र्वरा॑सु इ॒ष्टनिः॑ । आर्त॑नासु । इ॒ष्टनिः॑ । आद॑त् । ह॒व्यानि॑ । आ॒ऽद॒दिः । य॒ज्ञस्य॑ । के॒तुः । अ॒र्हणा॑ । अध॑ । स्म॒ । अ॒स्य॒ । हर्ष॑तः । हृषी॑वतः । विश्वे॑ । जु॒ष॒न्त॒ । पन्था॑म् । नरः॑ । शु॒भे । न । पन्था॑म् ॥

Mantra without Swara
स हि शर्धो न मारुतं तुविष्वणिरप्नस्वतीषूर्वरास्विष्टनिरार्तनास्विष्टनि:। आदद्धव्यान्याददिर्यज्ञस्य केतुरर्हणा। अध स्मास्य हर्षतो हृषीवतो विश्वे जुषन्त पन्थां नर: शुभे न पन्थाम् ॥

सः। हि। शर्धः। न। मारुतम्। तुविऽस्वणिः। अप्नस्वतीषु। उर्वरासु इष्टनिः। आर्तनासु। इष्टनिः। आदत्। हव्यानि। आऽददिः। यज्ञस्य। केतुः। अर्हणा। अध। स्म। अस्य। हर्षतः। हृषीवतः। विश्वे। जुषन्त। पन्थाम्। नरः। शुभे। न। पन्थाम् ॥ १.१२७.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विश्वे) सब (नरः) व्यवहारों की प्राप्ति करानेवाले मनुष्यो ! तुम (हृषीवतः) जो बहुत आनन्द से भरा (हर्षतः) और जिससे सब प्रकार का आनन्द प्राप्त हुआ (अस्य) इस (यज्ञस्य) सङ्ग करने अर्थात् पाने योग्य व्यवहार की (शुभे) उत्तमता के लिये (न) जैसे हो वैसे (पन्थाम्) धर्मयुक्त मार्ग का (जुषन्त) सेवन करो (अध) इसके अनन्तर जो (केतुः) ज्ञानवान् (आददिः) ग्रहण करनेहारा (अर्हणा) सत्कार किये अर्थात् नम्रता के साथ हुए (हव्यानि) भोजन के योग्य पदार्थों को (आदत्) खावे वा (मारुतम्) पवनों के (शर्धः) बल के (न) समान (अप्नस्वतीषु) जिनके प्रशंसित सन्तान विद्यमान उन (उर्वरासु) सुन्दरी (आर्त्तनासु) सत्य आचरण करनेवाली स्त्रियों के समीप (तुविष्वणिः) जिसकी बहुत उत्तम निरन्तर बोल-चाल (इष्टनिः) और जो सत्कार करने योग्य है (सः, स्म) वही विद्वान् (इष्टनिः) इच्छा करनेवाला (हि) निश्चय के साथ (पन्थाम्) न्याय मार्ग को प्राप्त होने योग्य होता है ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य धर्म से इकट्ठे किये हुए पदार्थों का भोग करते हुए प्रजाजनों में धर्म और विद्या आदि गुणों का प्रचार करते हैं, वे दूसरों से धर्ममार्ग का प्रचार करा सकते हैं ॥ ६ ॥
Subject
अब राजा आदि क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।