Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 127 / Mantra 5

191 Sukta
11 Mantra
1/127/5
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तम॑स्य पृ॒क्षमुप॑रासु धीमहि॒ नक्तं॒ यः सु॒दर्श॑तरो॒ दिवा॑तरा॒दप्रा॑युषे॒ दिवा॑तरात्। आद॒स्यायु॒र्ग्रभ॑णवद्वी॒ळु शर्म॒ न सू॒नवे॑। भ॒क्तमभ॑क्त॒मवो॒ व्यन्तो॑ अ॒जरा॑ अ॒ग्नयो॒ व्यन्तो॑ अ॒जरा॑: ॥

तम् । अ॒स्य॒ । पृ॒क्षम् । उप॑रासु । धी॒म॒हि॒ । नक्त॑म् । यः । सु॒दर्श॑ऽतरः । दिवा॑ऽतरात् । अप्र॑ऽआयुषे । दिवा॑तरात् । आत् । अ॒स्य॒ । आयुः॑ । ग्रभ॑णऽवत् । वी॒ळु॒ । शर्म॑ । न । सू॒नवे॑ । भ॒क्तम् । अभ॑क्तम् । अवः॑ । व्यन्तः॑ । अ॒जराः॑ । अ॒ग्नयः॑ । व्यन्तः॑ । अ॒जराः॑ ॥

Mantra without Swara
तमस्य पृक्षमुपरासु धीमहि नक्तं यः सुदर्शतरो दिवातरादप्रायुषे दिवातरात्। आदस्यायुर्ग्रभणवद्वीळु शर्म न सूनवे। भक्तमभक्तमवो व्यन्तो अजरा अग्नयो व्यन्तो अजरा: ॥

तम्। अस्य। पृक्षम्। उपरासु। धीमहि। नक्तम्। यः। सुदर्शऽतरः। दिवाऽतरात्। अप्रऽआयुषे। दिवातरात्। आत्। अस्य। आयुः। ग्रभणऽवत्। वीळु। शर्म। न। सूनवे। भक्तम्। अभक्तम्। अवः। व्यन्तः। अजराः। अग्नयः। व्यन्तः। अजराः ॥ १.१२७.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 12 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (सुदर्शतरः) अतीव सुन्दर देखने योग्य पूरी कलाओं से युक्त चन्द्रमा के समान राजा (अस्य) इस संसार का (दिवातरात्) अत्यन्त प्रकाशवान् सूर्य से (अप्रायुषे) जो व्यवहार नहीं प्राप्त होता उसके लिये (नक्तम्) रात्रि में सब पदार्थों को दिखलाता सा है (तम्) उस (पृक्षम्) उत्तम कामों का सम्बन्ध करनेवाले को (दिवातरात्) अतीव प्रकाशवान् सूर्य के तुल्य उससे (उपरासु) दिशाओं में हम लोग (धीमहि) धारण करें अर्थात् सुने (आत्) इसके अनन्तर (अस्य) इस मनुष्य का (ग्रभणवत्) जिसमें प्रशंसित सब व्यवहारों का ग्रहण उस (वीळु) दृढ़ (भक्तम्) सेवन किये वा (अभक्तम्) न सेवन किये हुए (अवः) रक्षा आदि युक्त कर्म और (आयुः) जीवन को (सूनवे) पुत्र के लिये (न) जैसे वैसे (शर्म) घर को (व्यन्तः) विविध प्रकार से प्राप्त होते हुए (अजराः) पूरी अवस्थावाले वा (अग्नयः) बिजुली रूप अग्नि के समान (व्यन्तः) सब पदार्थों की कामना करते हुए (अजराः) अवस्था होने से रहित हम लोग धारण करें ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कर है। जैसे चन्द्रमा तारागण और ओषधियों को पुष्ट करता है, वैसे सज्जनों को प्रजाजनों का पालन-पोषण करना चाहिये। जैसे सन्तानों को पिता-माता तृप्त करते हैं, वैसे सब प्राणियों को हम लोग तृप्त करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर न्यायाधीशों को क्या अनुष्ठान वा आचरण करने चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।