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Rigveda Mandal 1 / Sukta 127 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/127/4
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
दृ॒ळ्हा चि॑दस्मा॒ अनु॑ दु॒र्यथा॑ वि॒दे तेजि॑ष्ठाभिर॒रणि॑भिर्दा॒ष्ट्यव॑से॒ऽग्नये॑ दा॒ष्ट्यव॑से। प्र यः पु॒रूणि॒ गाह॑ते॒ तक्ष॒द्वने॑व शो॒चिषा॑। स्थि॒रा चि॒दन्ना॒ नि रि॑णा॒त्योज॑सा॒ नि स्थि॒राणि॑ चि॒दोज॑सा ॥

दृ॒ळ्हा । चि॒त् । अ॒स्मै॒ । अनु॑ । दुः॒ । यथा॑ । वि॒दे । तेजि॑ष्ठाभिः । अ॒रणि॑ऽभिः । दा॒ष्टि॒ । अव॑से । अ॒ग्नये॑ । दा॒श्टि॒ । अव॑से । प्र । यः । पु॒रूणि॑ । गाह॑ते । तक्ष॑त् । वना॑ऽइव । शो॒चिषा॑ । स्थि॒रा । चि॒त् । अन्ना॑ । नि । रि॒णा॒ति॒ । ओज॑सा । नि । स्थि॒राणि॑ । चि॒त् । ओज॑सा ॥

Mantra without Swara
दृळ्हा चिदस्मा अनु दुर्यथा विदे तेजिष्ठाभिररणिभिर्दाष्ट्यवसेऽग्नये दाष्ट्यवसे। प्र यः पुरूणि गाहते तक्षद्वनेव शोचिषा। स्थिरा चिदन्ना नि रिणात्योजसा नि स्थिराणि चिदोजसा ॥

दृळ्हा। चित्। अस्मै। अनु। दुः। यथा। विदे। तेजिष्ठाभिः। अरणिऽभिः। दाष्टि। अवसे। अग्नये। दाष्टि। अवसे। प्र। यः। पुरूणि। गाहते। तक्षत्। वनाऽइव। शोचिषा। स्थिरा। चित्। अन्ना। नि। रिणाति। ओजसा। नि। स्थिराणि। चित्। ओजसा ॥ १.१२७.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 12 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यथा) जैसे विद्वान् (तेजिष्ठाभिः) अत्यन्त तेजवाली (अरणिभिः) अरणियों से (अस्मै) इस (विदे) शास्त्रवेत्ता (अवसे) रक्षा करनेवाले (अग्नये) अग्नि के समान वर्त्तमान सभाध्यक्ष के लिये (दाष्टि) ओविली को घिसने से काटता वा विद्वान् जन (दृढा) (स्थिरा) निश्चल (चित्) भी विज्ञानों के (अनु, दुः) अनुक्रम से देवें, वैसे (यः) जो (अवसे) रक्षा आदि करने के लिये (दाष्टि) काटता अर्थात् उक्त क्रिया को करता वा (तक्षत्) अपने तेज से जल आदि को छिन्न-भिन्न करता हुआ सूर्यमण्डल (वनेव) किरणों को जैसे वैसे (शोचिषा) न्याय और सेना के प्रकाश से (पुरूणि) बहुत शत्रु दलों को (प्र, गाहते) अच्छे प्रकार विलोडता वा (ओजसा) पराक्रम से (स्थिराणि) स्थिर कर्मों को (नि) निरन्तर प्राप्त होता (चित्) और (ओजसा) कोमल काम से (अन्ना) खाने योग्य अन्नों को (चित्) भी (नि, रिणाति) निरन्तर प्राप्त होता है, वह सुख को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जैसे विद्वान् जन विद्या के प्रचार से मनुष्यों के आत्माओं को प्रकाशित कर सबको पुरुषार्थी बनाते हैं, वैसे न्यायाधीश विद्वान् प्रजाजनों को उद्यमी करते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर न्यायाधीशों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।