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Rigveda Mandal 1 / Sukta 127 / Mantra 3

191 Sukta
11 Mantra
1/127/3
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- अष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स हि पु॒रू चि॒दोज॑सा वि॒रुक्म॑ता॒ दीद्या॑नो॒ भव॑ति द्रुहन्त॒रः प॑र॒शुर्न द्रु॑हन्त॒रः। वी॒ळु चि॒द्यस्य॒ समृ॑तौ॒ श्रुव॒द्वने॑व॒ यत्स्थि॒रम्। नि॒:षह॑माणो यमते॒ नाय॑ते धन्वा॒सहा॒ नाय॑ते ॥

सः । हि । पु॒रु । चि॒त् । ओज॑सा । वि॒रुक्म॑ता । दीद्या॑नः । भव॑ति । द्रु॒ह॒म्ऽत॒रः । प॒र॒शुः । न । द्रु॒ह॒न्त॒रः । वी॒ळु । चि॒त् । यस्य॑ । सम्ऽऋ॑तौ । श्रुव॑त् । वना॑ऽइव । यत् । स्थि॒रम् । निः॒ऽसह॑माणः । य॒म॒ते॒ । न । अ॒य॒ते॒ । ध॒न्व॒ऽसहा॑ । न । अ॒य॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहन्तरः परशुर्न द्रुहन्तरः। वीळु चिद्यस्य समृतौ श्रुवद्वनेव यत्स्थिरम्। नि:षहमाणो यमते नायते धन्वासहा नायते ॥

सः। हि। पुरु। चित्। ओजसा। विरुक्मता। दीद्यानः। भवति। द्रुहम्ऽतरः। परशुः। न। द्रुहन्तरः। वीळु। चित्। यस्य। सम्ऽऋतौ। श्रुवत्। वनाऽइव। यत्। स्थिरम्। निःऽसहमाणः। यमते। न। अयते। धन्वऽसहा। न। अयते ॥ १.१२७.३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यस्य) जिसकी (समृतौ) अच्छे प्रकार प्राप्ति करानेवाली क्रिया के निमित्त (चित्) ही (वनेव) वनों के समान (वीळु) दृढ़ (स्थिरम्) निश्चल बल को (निःसहमानः) निरन्तर सहनशील वीरोंवाला (श्रुवत्) सुनता हुआ शत्रुओं को (यमते) नियम में लाता अर्थात् उनके सुने हुए उस बल को छिन्न-भिन्न कर उनको शत्रुता करने से रोकता वा जिसको शत्रुजन (नायते) नहीं प्राप्त होता वा (धन्वासह) जो अपने धनुष् से शत्रुओं को सहनेवाला शत्रु जनों को अच्छे प्रकार जीतता वा (यत्) जिसके विजय को शत्रु जन (नायते) नहीं प्राप्त होता वा जो (द्रुहन्तरः) द्रोह करनेवालों को तरता वह (परशुः) फरसा वा कुलाड़ा के (न) समान (पुरु) तीव्र बहुत प्रकार से ज्यों हो त्यों (विरुक्मता) जिससे अनेक प्रकार की प्रीतियाँ हों उस (ओजसा) बल के साथ (दीद्यानः) प्रकाशमान (द्रुहन्तरः) द्रुहन्तर (भवति) होता अर्थात् जिसके सहाय से अति द्रोह करनेवाले शत्रु को जीतता (सः, हि, चित्) वही कभी विजयी होते हैं ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो शत्रुओं से नहीं पराजित होता और अपने प्रशंसित बल से उनको जीत सकता है, वही प्रजा पालनेवालों में शिरोमणि होता है ॥ ३ ॥
Subject
इस संसार में कौन प्रजा की पालना करने के लिये उत्तम होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।