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Rigveda Mandal 1 / Sukta 127 / Mantra 11

191 Sukta
11 Mantra
1/127/11
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स नो॒ नेदि॑ष्ठं॒ ददृ॑शान॒ आ भ॒राग्ने॑ दे॒वेभि॒: सच॑नाः सुचे॒तुना॑ म॒हो रा॒यः सु॑चे॒तुना॑। महि॑ शविष्ठ नस्कृधि सं॒चक्षे॑ भु॒जे अ॒स्यै। महि॑ स्तो॒तृभ्यो॑ मघवन्त्सु॒वीर्यं॒ मथी॑रु॒ग्रो न शव॑सा ॥

सः । नः॒ । नेदि॑ष्ठम् । ददृ॑शानः । आ । भ॒र॒ । अग्ने॑ । दे॒वेभिः॑ । सऽच॑नाः । सुऽचे॒तुना॑ । म॒हः । र॒यः । सु॒ऽचे॒तुना॑ । महि॑ । श॒वि॒ष्ठ॒ । नः॒ । कृ॒धि॒ । स॒म्ऽचक्षे॑ । भु॒जे । अ॒स्यै । महि॑ । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । सु॒ऽवीर्य॑म् । मथीः॑ । उ॒ग्रः । न । शव॑सा ॥

Mantra without Swara
स नो नेदिष्ठं ददृशान आ भराग्ने देवेभि: सचनाः सुचेतुना महो रायः सुचेतुना। महि शविष्ठ नस्कृधि संचक्षे भुजे अस्यै। महि स्तोतृभ्यो मघवन्त्सुवीर्यं मथीरुग्रो न शवसा ॥

सः। नः। नेदिष्ठम्। ददृशानः। आ। भर। अग्ने। देवेभिः। सऽचनाः। सुऽचेतुना। महः। रायः। सुऽचेतुना। महि। शविष्ठ। नः। कृधि। सम्ऽचक्षे। भुजे। अस्यै। महि। स्तोतृऽभ्यः। मघऽवन्। सुऽवीर्यम्। मथीः। उग्रः। न। शवसा ॥ १.१२७.११

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) प्रशंसित धनयुक्त (शविष्ठ) अतीव बलवान् विद्यादि गुणों को पाये हुए (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान (सः) वह (ददृशानः) देखे हुए विद्वान् ! आप (सुचेतुना) सुन्दर समझनेवाले और (देवेभिः) विद्वानों के साथ (नः) हम लोगों के लिये (महः) बहुत (सचनाः) सम्बन्ध करने योग्य (रायः) धनों को (आ, भर) अच्छे प्रकार धारण करें (अस्यै) इस प्रजा के लिये (संचक्षे) उत्तमता में कहने उपदेश देने और (भुजे) इसको पालना करने के लिये (शवसा) अपने पराक्रम से (उग्रः) प्रचण्ड प्रतापवान् (न) के समान (मथीः) दुष्टों को मथनेवाले आप (नेदिष्ठम्) अत्यन्त समीप (महि) बहुत (सुवीर्यम्) उत्तम पराक्रम को अच्छे प्रकार धारण करो और इस (सुचेतुना) सुन्दर ज्ञान देनेवाले गुण से (महि) अधिकता से जैसे हो वैसे (स्तोतृभ्यः) स्तुति प्रशंसा करनेवालों से (नः) हम लोगों को विद्यावान् (कृधि) करो ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। विद्यार्थियों को चाहिये कि सकल शास्त्र पढ़े हुए धार्मिक विद्वानों की प्रार्थना और सेवा कर पूरी विद्याओं को पावें, जिससे राजा और प्रजाजन विद्यावान् होकर निरन्तर धर्म का आचरण करें ॥ ११ ॥इस सूक्त में विद्वान् और राजधर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता जाननी चाहिये ॥ यह एकसौ सत्ताईसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्यार्थियों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।