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Rigveda Mandal 1 / Sukta 127 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/127/10
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र वो॑ म॒हे सह॑सा॒ सह॑स्वत उष॒र्बुधे॑ पशु॒षे नाग्नये॒ स्तोमो॑ बभूत्व॒ग्नये॑। प्रति॒ यदीं॑ ह॒विष्मा॒न्विश्वा॑सु॒ क्षासु॒ जोगु॑वे। अग्रे॑ रे॒भो न ज॑रत ऋषू॒णां जूर्णि॒र्होत॑ ऋषू॒णाम् ॥

प्र । वः॒ । म॒हे । सह॑सा । सह॑स्वते । उ॒षः॒ऽबुधे॑ । प॒शु॒ऽसे । न । अ॒ग्नये॑ । स्तोमः॑ । ब॒भू॒तु॒ । अ॒ग्नये॑ । प्रति॑ । यत् । ई॒म् । ह॒विष्मान् । विश्वा॑सु । क्षासु॑ । जोगु॑वे । अग्रे॑ । रे॒भः । न । ज॒र॒ते॒ । ऋ॒षू॒णाम् । जूर्णिः॑ । होता॑ । ऋ॒षू॒णाम् ॥

Mantra without Swara
प्र वो महे सहसा सहस्वत उषर्बुधे पशुषे नाग्नये स्तोमो बभूत्वग्नये। प्रति यदीं हविष्मान्विश्वासु क्षासु जोगुवे। अग्रे रेभो न जरत ऋषूणां जूर्णिर्होत ऋषूणाम् ॥

प्र। वः। महे। सहसा। सहस्वते। उषःऽबुधे। पशुऽसे। न। अग्नये। स्तोमः। बभूतु। अग्नये। प्रति। यत्। ईम्। हविष्मान्। विश्वासु। क्षासु। जोगुवे। अग्रे। रेभः। न। जरते। ऋषूणाम्। जूर्णिः। होता। ऋषूणाम् ॥ १.१२७.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (वः) तुम लोगों के (सहस्वते) बहुत बलयुक्त (उषर्बुधे) प्रत्येक प्रभात समय में जागने और (पशुषे) प्रबन्ध बाँधनेहारे (महे) बड़े (जोगुवे) निरन्तर उपदेशक (अग्नये) बिजुली के (न) समान (अग्नये) प्रकाशमान के लिये (विश्वासु) सब (क्षासु) भूमियों में (हविष्मान्) प्रशंसित ग्रहण किये हुए व्यवहार जिसमें विद्यमान वह (स्तोमः) प्रशंसा (सहसा) बल के साथ (प्र, बभूतु) समर्थ हो (रेभः) उपदेश करनेवाले के (न) समान (अग्रे) आगे (ऋषूणाम्) जिन्होंने विद्या पाई वा जो विद्या को जानना चाहते उनकी विद्याओं की (ईम्) सब ओर से (प्रति, जरते) प्रत्यक्ष में स्तुति करता (यत्) जो (होता) भोजन करनेवाला (जूर्णिः) जूड़ी आदि रोग से रोगी हो वह (ऋषूणाम्) जिन्होंने वैद्य विद्या पाई अर्थात् उत्तम वैद्य हैं, उनके समीप जाकर रोगरहित हो ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन विद्या प्राप्ति के लिये अच्छा यत्न करते हैं, वैसे इस संसार में सब मनुष्यों को प्रयत्न करना चाहिये ॥ १० ॥
Subject
फिर समस्त मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।