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Rigveda Mandal 1 / Sukta 126 / Mantra 5

191 Sukta
7 Mantra
1/126/5
Devata- विद्वाँसः Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पूर्वा॒मनु॒ प्रय॑ति॒मा द॑दे व॒स्त्रीन्यु॒क्ताँ अ॒ष्टाव॒रिधा॑यसो॒ गाः। सु॒बन्ध॑वो॒ ये वि॒श्या॑ इव॒ व्रा अन॑स्वन्त॒: श्रव॒ ऐष॑न्त प॒ज्राः ॥

पूर्वा॑म् । अनु॑ । प्रऽय॑तिम् । आ । द॒दे॒ । वः॒ । त्रीन् । यु॒क्तान् । अ॒ष्टौ । अ॒रिऽधा॑यसः । गाः । सु॒ऽबन्ध॑वः । ये । वि॒श्याः॑ऽइव । व्राः । अन॑स्वन्तः । श्रवः॑ । ऐष॑न्त । प॒ज्राः ॥

Mantra without Swara
पूर्वामनु प्रयतिमा ददे वस्त्रीन्युक्ताँ अष्टावरिधायसो गाः। सुबन्धवो ये विश्या इव व्रा अनस्वन्त: श्रव ऐषन्त पज्राः ॥

पूर्वाम्। अनु। प्रऽयतिम्। आ। ददे। वः। त्रीन्। युक्तान्। अष्टौ। अरिऽधायसः। गाः। सुऽबन्धवः। ये। विश्याःऽइव। व्राः। अनस्वन्तः। श्रवः। ऐषन्त। पज्राः ॥ १.१२६.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो ऐसे हैं कि (सुबन्धवः) जिनके उत्तम बन्धुजन (अनस्वन्तः) और बहुत लढ़ा छकड़ा विद्यमान (व्राः) तथा जो गमन करनेवाले और (पज्राः) दूसरों को प्राप्त वे (विश्याइव) प्रजाजनों में उत्तम वणिक् जनों के समान (श्रवः) अन्न को (ऐषन्त) चाहें उन (वः) तुम्हारे (त्रीन्) तीन (युक्तान्) आज्ञा दिये और अधिकार पाये भृत्यों (अष्टौ) आठ सभासदों (अरिधायसः) जिनसे शत्रुओं को धारण करते समझते उन वीरों और (गाः) बैल आदि पशुओं को तथा इन सभों की (पूर्वाम्) पहिली (प्रयतिम्) उत्तम यत्न की रीति को मैं (अनु, आ, ददे) अनुकूलता से ग्रहण करता हूँ ॥ ५ ॥
Essence
जो जन सभा, सेना और शाला के अधिकारी, कुशल चतुर आठ सभासदों, शत्रुओं का विनाश करनेवाले वीरों, गौ बैल आदि पशुओं, मित्र, धनी, वणिक्जनों और खेती करनेवालों की अच्छे प्रकार रक्षा करके अन्न आदि ऐश्वर्य्य की उन्नति करते हैं, वे मनुष्यों में शिरोमणि अर्थात् अत्यन्त उत्तम होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
कौन मनुष्य इस जगत् में उत्तम होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।