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Rigveda Mandal 1 / Sukta 125 / Mantra 6

191 Sukta
7 Mantra
1/125/6
Devata- दम्पती Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दक्षि॑णावता॒मिदि॒मानि॑ चि॒त्रा दक्षि॑णावतां दि॒वि सूर्या॑सः। दक्षि॑णावन्तो अ॒मृतं॑ भजन्ते॒ दक्षि॑णावन्त॒: प्र ति॑रन्त॒ आयु॑: ॥

दक्षि॑णाऽवताम् । इत् । इ॒मानि॑ । चि॒त्रा । दक्षि॑णाऽवताम् । दि॒वि । सूर्या॑सः । दक्षि॑णाऽवन्तः । अ॒मृत॑म् । भ॒ज॒न्ते॒ । दक्षि॑णाऽवन्तः । प्र । ति॒र॒न्ते॒ । आयुः॑ ॥

Mantra without Swara
दक्षिणावतामिदिमानि चित्रा दक्षिणावतां दिवि सूर्यासः। दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते दक्षिणावन्त: प्र तिरन्त आयु: ॥

दक्षिणाऽवताम्। इत्। इमानि। चित्रा। दक्षिणाऽवताम्। दिवि। सूर्यासः। दक्षिणाऽवन्तः। अमृतम्। भजन्ते। दक्षिणाऽवन्तः। प्र। तिरन्ते। आयुः ॥ १.१२५.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 6

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Meaning
(दक्षिणावताम्) जिनके धर्म से इकट्ठे किये धन, विद्या आदि बहुत पदार्थ विद्यमान हैं, उन मनुष्यों को (इमानि) ये प्रत्यक्ष (चित्रा) चित्र-विचित्र अद्भुत सुख (दक्षिणावताम्) जिनके प्रशंसित धर्म के अनुकूल धन और विद्या की दक्षिणा का दान होता, उन सज्जनों को (दिवि) उत्तम प्रकाश में (सूर्य्यासः) सूर्य्य के समान तेजस्वी जन प्राप्त होते हैं (दक्षिणावन्तः) बहुत विद्या-दानयुक्त सत्पुरुष (इत्) ही (अमृतम्) मोक्ष का (भजन्ते) सेवन करते और (दक्षिणावन्तः) बहुत प्रकार का अभय देनेहारे जन (आयुः) आयु के (प्रतिरन्ते) अच्छे प्रकार पार पहुँचे अर्थात् पूरी आयु भोगते हैं ॥ ६ ॥
Essence
जो ब्राह्मण सब मनुष्यों के सुख के लिये विद्या और उत्तम शिक्षा का दान, वा जो क्षत्रिय न्याय के अनुकूल व्यवहार से प्रजा जनों को अभय दान, वा जो वैश्य धर्म से इकट्ठे किये हुए धन का दान और जो शूद्र सेवा दान करते हैं, वे पूर्ण आयुवाले होकर इस जन्म और दूसरे जन्म में निरन्तर आनन्द को भोगते हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर चारों वर्णों में स्थिर होनेवाले मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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