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Rigveda Mandal 1 / Sukta 125 / Mantra 5

191 Sukta
7 Mantra
1/125/5
Devata- दम्पती Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
नाक॑स्य पृ॒ष्ठे अधि॑ तिष्ठति श्रि॒तो यः पृ॒णाति॒ स ह॑ दे॒वेषु॑ गच्छति। तस्मा॒ आपो॑ घृ॒तम॑र्षन्ति॒ सिन्ध॑व॒स्तस्मा॑ इ॒यं दक्षि॑णा पिन्वते॒ सदा॑ ॥

नाक॑स्य । पृ॒ष्ठे । अधि॑ । ति॒ष्ठ॒ति॒ । श्रि॒तः । यः । पृ॒णाति॑ । सः । ह॒ । दे॒वेषु॑ । ग॒च्छ॒ति॒ । तस्मै॑ । आपः॑ । घृ॒तम् । अ॒र्ष॒न्ति॒ । सिन्ध॑वः । तस्मै॑ । इ॒यम् । दक्षि॑णा । पि॒न्व॒ते॒ । सदा॑ ॥

Mantra without Swara
नाकस्य पृष्ठे अधि तिष्ठति श्रितो यः पृणाति स ह देवेषु गच्छति। तस्मा आपो घृतमर्षन्ति सिन्धवस्तस्मा इयं दक्षिणा पिन्वते सदा ॥

नाकस्य। पृष्ठे। अधि। तिष्ठति। श्रितः। यः। पृणाति। सः। ह। देवेषु। गच्छति। तस्मै। आपः। घृतम्। अर्षन्ति। सिन्धवः। तस्मै। इयम्। दक्षिणा। पिन्वते। सदा ॥ १.१२५.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 5

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Meaning
(यः) जो मनुष्य (देवेषु) दिव्यगुण वा उत्तम विद्वानों में (गच्छति) जाता है (सः, ह) वही विद्या के (श्रितः) आश्रय को प्राप्त हुआ (नाकस्य) जिसमें किञ्चित् दुःख नहीं उस उत्तम सुख के (पृष्ठे) आधार (अधि, तिष्ठति) पर स्थिर होता वा (पृणाति) विद्या उत्तम शिक्षा और अच्छे बनाए हुए अन्न आदि पदार्थों से आप पुष्ट होता और सन्तान को पुष्ट करता है (तस्मै) उसके लिये (आपः) प्राण वा जल (सदा) सब कभी (घृतम्) घी (अर्षन्ति) वर्षाते तथा (तस्मै) उसके लिये (इयम्) यह पढ़ाने से मिली हुई (दक्षिणा) और (सिन्धवः) नदीनद (सदा) सब कभी (पिन्वते) प्रसन्नता करते हैं ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य इस मनुष्य देह का आश्रय कर सत्पुरुषों का सङ्ग और धर्म के अनुकूल आचरण को सदा करते वे सदैव सुखी होते हैं। जो विद्वान् वा जो विदुषी पण्डिता स्त्री, बालक, ज्वान और बुड्ढे मनुष्यों तथा कन्या, युवति और बुड्ढी स्त्रियों को निष्कपटता से विद्या और उत्तम शिक्षा को निरन्तर प्राप्त कराते, वे इस संसार में समग्र सुख को प्राप्त होकर अन्तकाल में मोक्ष को अधिगत होते अर्थात् अधिकता से प्राप्त होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
इस संसार में मनुष्यों को किन कामों से मोक्ष प्राप्त हो सकता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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