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Rigveda Mandal 1 / Sukta 125 / Mantra 3

191 Sukta
7 Mantra
1/125/3
Devata- दम्पती Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आय॑म॒द्य सु॒कृतं॑ प्रा॒तरि॒च्छन्नि॒ष्टेः पु॒त्रं वसु॑मता॒ रथे॑न। अं॒शोः सु॒तं पा॑यय मत्स॒रस्य॑ क्ष॒यद्वी॑रं वर्धय सू॒नृता॑भिः ॥

आय॑म् । अ॒द्य । सु॒ऽकृत॑म् । प्रा॒तः । इ॒च्छन् । इ॒ष्टेः । पु॒त्रम् । वसु॑मता । रथे॑न । अं॒शोः । सु॒तम् । पा॒य॒य॒ । म॒त्स॒रस्य॑ । क्ष॒यत्ऽवी॑रम् । व॒र्ध॒य॒ । सू॒नृता॑भिः ॥

Mantra without Swara
आयमद्य सुकृतं प्रातरिच्छन्निष्टेः पुत्रं वसुमता रथेन। अंशोः सुतं पायय मत्सरस्य क्षयद्वीरं वर्धय सूनृताभिः ॥

आयम्। अद्य। सुऽकृतम्। प्रातः। इच्छन्। इष्टेः। पुत्रम्। वसुमता। रथेन। अंशोः। सुतम्। पायय। मत्सरस्य। क्षयत्ऽवीरम्। वर्धय। सूनृताभिः ॥ १.१२५.३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे धायि ! मैं (अद्य) आज (वसुमता) प्रशंसित धनयुक्त (रथेन) मनोहर रमण करने योग्य रथ आदि यान से (प्रातः) प्रभात समय (इष्टेः) चाहे हुए गृहाश्रम के स्थान से (सुकृतम्) धर्मयुक्त काम की (इच्छन्) इच्छा करता हुआ जिस (पुत्रम्) पवित्र बालक को (आयम्) पाऊँ उस (सुतम्) उत्पन्न हुए पुत्र को (मत्सरस्य) आनन्द करानेवाला जो (अंशोः) स्त्री का शरीर उसके भाग से जो रस अर्थात् दूध उत्पन्न होता उस दूध को (पायय) पिला। हे वीर ! (सूनृताभिः) विद्या सत्य भाषण आदि शुभगुणयुक्त वाणियों से (क्षयद्वीरम्) शत्रुओं का क्षय करनेवालों में प्रशंसित वीर पुरुष की (वर्द्धय) उन्नति कर ॥ ३ ॥
Essence
स्त्री-पुरुष पूरे ब्रह्मचर्य से विद्या का संग्रह और एक-दूसरे की प्रसन्नता से विवाह कर धर्मयुक्त व्यवहार से पुत्र आदि सन्तानों को उत्पन्न करें और उनकी रक्षा कराने के लिये धर्मवती धायि को देवें और वह इस सन्तान को उत्तम शिक्षा से युक्त करे ॥ ३ ॥
Subject
फिर इस संसार में स्त्री और पुरुष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।