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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 8

191 Sukta
13 Mantra
1/124/8
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्वसा॒ स्वस्रे॒ ज्याय॑स्यै॒ योनि॑मारै॒गपै॑त्यस्याः प्रति॒चक्ष्ये॑व। व्यु॒च्छन्ती॑ र॒श्मिभि॒: सूर्य॑स्या॒ञ्ज्य॑ङ्क्ते समन॒गा इ॑व॒ व्राः ॥

खसा॑ । स्वस्रे॑ । ज्याय॑स्यै । योनि॑म् । अ॒रै॒क् । अप॑ । ए॒ति॒ । अ॒स्याः॒ । प्र॒ति॒ऽचक्ष्य॑ऽइव । वि॒ऽउ॒च्छन्ती॑ । र॒श्मिऽभिः॑ । सूर्य॑स्य । अ॒ञ्जि । अ॒ङ्क्ते॒ । स॒म॒न॒गाःऽइ॑व । व्राः ॥

Mantra without Swara
स्वसा स्वस्रे ज्यायस्यै योनिमारैगपैत्यस्याः प्रतिचक्ष्येव। व्युच्छन्ती रश्मिभि: सूर्यस्याञ्ज्यङ्क्ते समनगा इव व्राः ॥

स्वसा। स्वस्रे। ज्यायस्यै। योनिम्। अरैक्। अप। एति। अस्याः। प्रतिऽचक्ष्यऽइव। विऽउच्छन्ती। रश्मिऽभिः। सूर्यस्य। अञ्जि। अङ्क्ते। समनगाःऽइव। व्राः ॥ १.१२४.८

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 3

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Meaning
हे कन्या ! जैसे (व्युच्छन्ती) अन्धकार का निवारण करती हुई (व्राः) पदार्थों को स्वीकार करनेवाली प्रातःसमय की वेला (सूर्यस्य) सूर्यमण्डल की (रश्मिभिः) किरणों के साथ (अञ्जि) प्रसिद्ध रूप को (समनगाइव) निश्चय किये स्थान को जानेवाली स्त्री के समान (अङ्क्ते) प्रकाश करती है वा जैसे (स्वसा) बहिन (ज्यायस्यै) जेठी (स्वस्रे) बहिन के लिये (योनिम्) अपने स्थान को (अरैक्) छोड़ती अर्थात् उत्थान देती तथा (अस्याः) इस अपनी बहिन के वर्त्तमान हाल को (प्रतिचक्ष्येव) प्रत्यक्ष देख के जैसे वैसे विवाह के लिये (अपैति) दूर जाती है, वैसी तूँ हो ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। छोटी बहिन जेठी बहिन के वर्त्तमान हाल को जान आप स्वयंवर विवाह के लिये दूर भी ठहरे हुए अपने अनुकूल पति का ग्रहण करे, जैसे शान्त पतिव्रता स्त्री अपने अपने पति को सेवन करती है, वैसे अपने पति का सेवन करे, जैसे सूर्य अपनी कान्ति के साथ और कान्ति सूर्य के साथ नित्य अनुकूलता से वर्त्ते, वैसे ही स्त्री-पुरुष हों ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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