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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 6

191 Sukta
13 Mantra
1/124/6
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वेदे॒षा पु॑रु॒तमा॑ दृ॒शे कं नाजा॑मिं॒ न परि॑ वृणक्ति जा॒मिम्। अ॒रे॒पसा॑ त॒न्वा॒३॒॑ शाश॑दाना॒ नार्भा॒दीष॑ते॒ न म॒हो वि॑भा॒ती ॥

ए॒व । इत् । ए॒षा । पु॒रु॒ऽतमा॑ । दृ॒शे । कम् । न । अजा॑मिम् । न । परि॑ । वृ॒ण॒क्ति॒ । जा॒मिम् । अ॒रे॒पसा॑ । त॒न्वा॑ । शाश॑दाना । न । अर्भा॑त् । ईष॑ते । न । म॒हः । वि॒ऽभा॒ती ॥

Mantra without Swara
एवेदेषा पुरुतमा दृशे कं नाजामिं न परि वृणक्ति जामिम्। अरेपसा तन्वा३ शाशदाना नार्भादीषते न महो विभाती ॥

एव। इत्। एषा। पुरुऽतमा। दृशे। कम्। न। अजामिम्। न। परि। वृणक्ति। जामिम्। अरेपसा। तन्वा। शाशदाना। न। अर्भात्। ईषते। न। महः। विऽभाती ॥ १.१२४.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (अरेपसा) न कँपते हुए निर्भय (तन्वा) शरीर से (शाशदाना) अति सुन्दरी (पुरुतमा) बहुत पदार्थों को चाहनेवाली स्त्री (दृशे) देखने के लिये (कम्) सुख को पति के (न) समान (परि, वृणक्ति) सब ओर से (न) नहीं छोड़ती पति भी (जामिम्) अपनी स्त्री के (न) समान सुख को (न) नहीं छोड़ता और (अजामिम्) जो अपनी स्त्री नहीं उसको सब प्रकार से छोड़ता है, वैसे (एव) ही (एषा) यह प्रातःसमय की वेला (अर्भात्) थोड़े से (इत्) भी (महः) बहुत सूर्य के तेज का (विभाती) प्रकाश कराती हुई बड़े फैलते हुए सूर्य के प्रकाश को नहीं छोड़ती किन्तु समस्त को (ईषते) प्राप्त होती है ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पति को छोड़ और के पति का सङ्ग नहीं करती वा जैसे स्त्रीव्रत पुरुष अपनी स्त्री से भिन्न दूसरी स्त्री का सम्बन्ध नहीं करता और विवाह किये हुए स्त्रीपुरुष नियम और समय के अनुकूल सङ्ग करते हैं, वैसे ही प्रातःसमय की वेला नियमयुक्त देश और समय को छोड़ अन्यत्र युक्त नहीं होती ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।