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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 5

191 Sukta
13 Mantra
1/124/5
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पूर्वे॒ अर्धे॒ रज॑सो अ॒प्त्यस्य॒ गवां॒ जनि॑त्र्यकृत॒ प्र के॒तुम्। व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑य॒ ओभा पृ॒णन्ती॑ पि॒त्रोरु॒पस्था॑ ॥

पूर्वे॑ । अर्धे॑ । रज॑सः । अ॒प्त्यस्य॑ । गवा॑म् । जनि॑त्री । अ॒कृ॒त॒ । प्र । के॒तुम् । वि । ऊँ॒ इति॑ । प्र॒थ॒ते॒ । वि॒ऽत॒रम् । वरी॑यः । आ । उ॒भा । पृ॒णन्ती॑ । पि॒त्रोः । उ॒पऽस्था॑ ॥

Mantra without Swara
पूर्वे अर्धे रजसो अप्त्यस्य गवां जनित्र्यकृत प्र केतुम्। व्यु प्रथते वितरं वरीय ओभा पृणन्ती पित्रोरुपस्था ॥

पूर्वे। अर्धे। रजसः। अप्त्यस्य। गवाम्। जनित्री। अकृत। प्र। केतुम्। वि। ऊँ इति। प्रथते। विऽतरम्। वरीयः। आ। उभा। पृणन्ती। पित्रोः। उपऽस्था ॥ १.१२४.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे प्रातःसमय की वेला कन्या के तुल्य (उभा) दोनों लोकों को (पृणन्ती) सुख से पूरती और (पित्रोः) अपने माता-पिता के समान भूमि और सूर्यमण्डल की (उपस्था) गोद में ठहरी हुई (वितरम्) जिससे विविध प्रकार के दुःखों से पार होते हैं, उस (वरीयः) अत्यन्त उत्तम काम को (वि, उ, प्रथते) विशेष करके तो विस्तारती तथा (गवाम्) सूर्य की किरणों को (जनित्री) उत्पन्न करनेवाली (अप्त्यस्य) विस्तार युक्त संसार में हुए (रजसः) लोक समूह के (पूर्वे) प्रथम आगे वर्त्तमान (अर्द्धे) आधे भाग में (केतुम्) किरणों को (प्र, आ, अकृत) प्रसिद्ध करती है, वैसा वर्तमान करती हुई स्त्री उत्तम होती है ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। प्रभात वेला से प्रसिद्ध हुआ सूर्यमण्डल का प्रकाश भूगोल के आधे भाग में सब कभी उजेला करता है और आधे भाग में रात्रि होती है, उन दिन रात्रि के बीच में प्रातःसमय की वेला विराजमान है, ऐसे निरन्तर रात्रि प्रभातवेला और दिन क्रम से वर्त्तमान हैं। इससे क्या आया कि जितना पृथिवी का प्रदेश सूर्यमण्डल के आगे होता, उतने में दिन और जितना पीछे होता जाता, उतने में रात्रि होती तथा सायं और प्रातःकाल की सन्धि में उषा होती है, इसी उक्त प्रकार से लोकों के घूमने के द्वारा ये सायं प्रातःकाल भी घूमते से दिखाई देते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।