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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 4

191 Sukta
13 Mantra
1/124/4
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उपो॑ अदर्शि शु॒न्ध्युवो॒ न वक्षो॑ नो॒धा इ॑वा॒विर॑कृत प्रि॒याणि॑। अ॒द्म॒सन्न स॑स॒तो बो॒धय॑न्ती शश्वत्त॒मागा॒त्पुन॑रे॒युषी॑णाम् ॥

उपो॒ इति॑ । अ॒द॒र्शि॒ । शु॒न्ध्युवः॑ । न । वक्षः॑ । नो॒धाःऽइ॑व । आ॒विः । अ॒कृ॒त॒ । प्रि॒याणि॑ । अ॒द्म॒ऽसत् । न । स॒स॒तः । बो॒धय॑न्ती । श॒श्व॒त्ऽत॒मा । आ । अ॒गा॒त् । पुनः॑ । आ॒ऽई॒युषी॑णाम् ॥

Mantra without Swara
उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि। अद्मसन्न ससतो बोधयन्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम् ॥

उपो इति। अदर्शि। शुन्ध्युवः। न। वक्षः। नोधाःऽइव। आविः। अकृत। प्रियाणि। अद्मऽसत्। न। ससतः। बोधयन्ती। शश्वत्ऽतमा। आ। अगात्। पुनः। आऽईयुषीणाम् ॥ १.१२४.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे प्रभातवेला (वक्षः) पाये पदार्थ को (शुन्ध्युवः) सूर्य की किरणों के (न) समान वा (प्रियाणि) प्रिय वचनों की (नोधाइव) सब शास्त्रों की स्तुति प्रशंसा करनेवाले विद्वान् के समान वा (अद्मसत्) भोजन के पदार्थों को पकानेवाले के (न) समान (ससतः) सोते हुए प्राणियों को (बोधयन्ती) निरन्तर जगाती हुई और (एयुषीणाम्) सब ओर से व्यतीत हो गईं प्रभात वेलाओं की (शश्वत्तमा) अतीव सनातन होती हुई (पुनः) फिर (आ, अगात्) आती और (आविरकृत) संसार को प्रकाशित करती वह हम लोगों ने (उपो) समीप में (अदर्शि) देखी, वैसी स्त्री उत्तम होती है ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो स्त्री प्रभात वेला वा सूर्य वा विद्वान् के समान अपने सन्तानों को उत्तम शिक्षा से विद्वान् करती है, वह सबको सत्कार करने योग्य है ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।