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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 3

191 Sukta
13 Mantra
1/124/3
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒षा दि॒वो दु॑हि॒ता प्रत्य॑दर्शि॒ ज्योति॒र्वसा॑ना सम॒ना पु॒रस्ता॑त्। ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑ति सा॒धु प्र॑जान॒तीव॒ न दिशो॑ मिनाति ॥

ए॒षा । दि॒वः । दु॒हि॒ता । प्रति॑ । अ॒द॒र्शि॒ । ज्योतिः॑ । वसा॑ना । स॒म॒ना । पु॒रस्ता॑त् । ऋ॒तस्य॑ । पन्था॑म् । अनु॑ । ए॒ति॒ । सा॒धु । प्र॒जा॒न॒तीऽइ॑व । न । दिशः॑ । मि॒ना॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात्। ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति ॥

एषा। दिवः। दुहिता। प्रति। अदर्शि। ज्योतिः। वसाना। समना। पुरस्तात्। ऋतस्य। पन्थाम्। अनु। एति। साधु। प्रजानतीऽइव। न। दिशः। मिनाति ॥ १.१२४.३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे ही (एषा) यह प्रातःसमय की वेला (ज्योतिः) प्रकाश को (वसाना) ग्रहण करती हुई (समना) संग्राम में (दिवः) सूर्य के प्रकाश की (दुहिता) लड़की सी हम लोगों ने (पुरस्तात्) दिन के पहिले (प्रत्यदर्शि) प्रतीति से देखी वा जैसे समस्त विद्या पढ़ा हुआ वीर जन (ऋतस्य) सत्य कारण के (पन्थाम्) मार्ग को (अन्वेति) अनुकूलता से प्राप्त होता वा (साधु) अच्छे प्रकार जैसे हो वैसे (प्रजानतीव) विशेष ज्ञानवाली विदुषी पढ़ी हुई पण्डिता स्त्री के समान प्रभात वेला (दिशः) दिशाओं को (न) नहीं (मिनाति) छोड़ती वैसे अपना वर्त्ताव वर्त्तती हुई स्त्री उत्तम हों ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अच्छे नियम से वर्त्तमान हुई प्रातः समय की वेला सबको आनन्दित कराती और वह अपने उत्तम स्वभाव को नहीं नष्ट करती, वैसे स्त्री लोग गिरस्ती के धर्म में वर्त्तें ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।