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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 2

191 Sukta
13 Mantra
1/124/2
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अमि॑नती॒ दैव्या॑नि व्र॒तानि॑ प्रमिन॒ती म॑नु॒ष्या॑ यु॒गानि॑। ई॒युषी॑णामुप॒मा शश्व॑तीनामायती॒नां प्र॑थ॒मोषा व्य॑द्यौत् ॥

अमि॑नती । दैव्या॑नि । व्र॒तानि॑ । प्र॒ऽमि॒न॒ती । म॒नु॒ष्या॑ । यु॒गानि॑ । ई॒युषी॑णाम् । उ॒प॒ऽमा । शश्व॑तीनाम् । आ॒ऽय॒ती॒नाम् । प्र॒थ॒मा । उ॒षाः । वि । अ॒द्यौ॒त् ॥

Mantra without Swara
अमिनती दैव्यानि व्रतानि प्रमिनती मनुष्या युगानि। ईयुषीणामुपमा शश्वतीनामायतीनां प्रथमोषा व्यद्यौत् ॥

अमिनती। दैव्यानि। व्रतानि। प्रऽमिनती। मनुष्या। युगानि। ईयुषीणाम्। उपऽमा। शश्वतीनाम्। आऽयतीनाम्। प्रथमा। उषाः। वि। अद्यौत् ॥ १.१२४.२

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री ! जैसे (उषाः) प्रातःसमय की वेला (दैव्यानि) दिव्य गुणवाले (व्रतानि) सत्य पदार्थ वा सत्य कर्मों को (अमिनती) न छोड़ती और (मनुष्या) मनुष्यों के सम्बन्धी (युगानि) वर्षों को (प्रमिनती) अच्छे प्रकार व्यतीत करती हुई (शश्वतीनाम्) सनातन प्रभातवेलाओं वा प्रकृतियों और (ईयुषीणाम्) हो गईं प्रभातवेलाओं की (उपमा) उपमा दृष्टान्त और (आयतीनाम्) आनेवाली प्रभातवेलाओं में (प्रथमा) पहिली संसार को (व्यद्यौत्) अनेक प्रकार से प्रकाशित कराती और जागते अर्थात् व्यवहारों को करते हुए मनुष्यों को युक्ति के साथ सदा सेवन करने योग्य है, वैसे तूँ अपना वर्त्ताव रख ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह प्रातःसमय की वेला विस्तारयुक्त पृथ्वी और सूर्य के साथ चलनेहारी जितने पूर्व देश को छोड़ती उतने उत्तर देश को ग्रहण करती है तथा वर्त्तमान और व्यतीत हुई प्रातःसमय की वेलाओं की उपमा और आनेवालियों की पहिली हुई कार्यरूप जगत् का और जगत् के कारण का अच्छे प्रकार ज्ञान कराती और सत्य धर्म के आचरण निमित्तक समय का अङ्ग होने से उमर को घटाती हुई वर्त्तमान है, वह सेवन की हुई बुद्धि और आरोग्य आदि अच्छे गुणों को देती है, वैसे पण्डिता स्त्री हों ॥ २ ॥
Subject
अब उषा के दृष्टान्त से स्त्री के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।