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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 13

191 Sukta
13 Mantra
1/124/13
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अस्तो॑ढ्वं स्तोम्या॒ ब्रह्म॑णा॒ मेऽवी॑वृधध्वमुश॒तीरु॑षासः। यु॒ष्माकं॑ देवी॒रव॑सा सनेम सह॒स्रिणं॑ च श॒तिनं॑ च॒ वाज॑म् ॥

अस्तो॑ढ्वम् । स्तो॒म्याः॒ । ब्रह्म॑णा । मे॒ । अवी॑वृधध्वम् । उ॒श॒तीः । उ॒ष॒सः॒ । यु॒ष्माक॑म् । दे॒वीः॒ । अव॑सा । स॒ने॒म॒ । स॒ह॒स्रिण॑म् । च॒ । श॒तिन॑म् । च॒ । वाज॑म् ॥

Mantra without Swara
अस्तोढ्वं स्तोम्या ब्रह्मणा मेऽवीवृधध्वमुशतीरुषासः। युष्माकं देवीरवसा सनेम सहस्रिणं च शतिनं च वाजम् ॥

अस्तोढ्वम्। स्तोम्याः। ब्रह्मणा। मे। अवीवृधध्वम्। उशतीः। उषसः। युष्माकम्। देवीः। अवसा। सनेम। सहस्रिणम्। च। शतिनम्। च। वाजम् ॥ १.१२४.१३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उषासः) प्रभात वेलाओं के तुल्य (स्तोम्याः) स्तुति करने के योग्य (देवीः) दिव्य विद्यागुणवाली पण्डिताओ ! (ब्रह्मणा) वेद से (उशतीः) कामना और कान्ति को प्राप्त होती हुई तुम (मे) मेरे लिये विद्याओं की (अस्तोढ्वम्) स्तुति प्रशंसा करो और (अवीवृधध्वम्) हम लोगों की उन्नति कराओ तथा (युष्माकम्) तुम्हारी (अवसा) रक्षा आदि से (सहस्रिणम्) जिसमें सहस्रों गुण विद्यमान (च) और जो (शतिनम्) सैकड़ों प्रकार की विद्याओं से युक्त (च) और (वाजम्) अङ्ग, उपाङ्ग, उपनिषदों सहित वेदादि शास्त्रों का बोध उसको दूसरों के लिये हम लोग (सनेम) देवें ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातर्वेला अच्छे गुण, कर्म और स्वभाववाली है, वैसी स्त्री हों और वैसे उत्तम गुण, कर्मवाले मनुष्य हों जैसे और विद्वान् से अपने प्रयोजन के लिये विद्या लेवें, वैसे ही प्रीति से औरों के लिये भी विद्या देवें ॥ १३ ॥इस सूक्त में प्रभात वेला के दृष्टान्त से स्त्रियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह १२४ वाँ सूक्त और ९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर कैसी स्त्री श्रेष्ठ हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।