Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 12

191 Sukta
13 Mantra
1/124/12
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उत्ते॒ वय॑श्चिद्वस॒तेर॑पप्त॒न्नर॑श्च॒ ये पि॑तु॒भाजो॒ व्यु॑ष्टौ। अ॒मा स॒ते व॑हसि॒ भूरि॑ वा॒ममुषो॑ देवि दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य ॥

उत् । ते॒ । वयः॑ । चि॒त् । व॒स॒तेः । अ॒प॒प्त॒न् । नरः॑ । च॒ । ये । पि॒तु॒ऽभाजः॑ । विऽउ॑ष्टौ । अ॒मा । स॒ते । व॒ह॒सि॒ । भूरि॑ । वा॒मम् । उषः॑ । दे॒वि॒ । दा॒शुषे॑ । मर्त्या॑य ॥

Mantra without Swara
उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ। अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय ॥

उत्। ते। वयः। चित्। वसतेः। अपप्तन्। नरः। च। ये। पितुऽभाजः। विऽउष्टौ। अमा। सते। वहसि। भूरि। वामम्। उषः। देवि। दाशुषे। मर्त्याय ॥ १.१२४.१२

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) मनुष्यो ! (ये) जो (पितुभाजः) अन्न का विभाग करनेवाले तुम लोग (चित्) भी जैसे (वयः) अवस्था को (वसतेः) वसीति से (उत् अपप्तन्) उत्तमता के साथ प्राप्त होते वैसे ही (व्युष्टौ) विशेष निवास में (अमा) समीप के घर वा (सते) वर्त्तमान व्यवहार के लिये होओ और हे (उषः) प्रातःसमय के प्रकाश के समान विद्याप्रकाशयुक्त (देवि) उत्तम व्यवहार की देनेवाली स्त्री ! जो तूँ (च) भी (दाशुषे) देनेवाले (मर्त्याय) अपने पति के लिये तथा समीप के घर और वर्त्तमान व्यवहार के लिये (भूरि) बहुत (वामम्) प्रशंसनीय व्यवहार की (वहसि) प्राप्ति करती, उस (ते) तेरे लिये उक्त व्यवहार की प्राप्ति तेरा पति भी करे ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पखेरू ऊपर और नीचे जाते हैं, वैसे प्रातःसमय की वेला रात्रि और दिन के ऊपर और नीचे जाती है तथा जैसे स्त्री पति के प्रियाचरण को करे, वैसे ही पति भी स्त्री के प्यारे आचरण को करे ॥ १२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।