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Rigveda Mandal 1 / Sukta 124 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/124/10
Devata- उषाः Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः औशिजः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र बो॑धयोषः पृण॒तो म॑घो॒न्यबु॑ध्यमानाः प॒णय॑: ससन्तु। रे॒वदु॑च्छ म॒घव॑द्भ्यो मघोनि रे॒वत्स्तो॒त्रे सू॑नृते जा॒रय॑न्ती ॥

प्र । बो॒ध॒य॒ । उ॒षः॒ । पृ॒ण॒तः । म॒घो॒नि॒ । अबु॑ध्यमानाः । प॒णयः॑ । स॒स॒न्तु॒ । रे॒वत् । उ॒च्छ॒ । म॒घव॑त्ऽभ्यः । म॒घो॒नि॒ । रे॒वत् । स्तो॒त्रे । सू॒नृ॒ते॒ । जा॒रय॑न्ती ॥

Mantra without Swara
प्र बोधयोषः पृणतो मघोन्यबुध्यमानाः पणय: ससन्तु। रेवदुच्छ मघवद्भ्यो मघोनि रेवत्स्तोत्रे सूनृते जारयन्ती ॥

प्र। बोधय। उषः। पृणतः। मघोनि। अबुध्यमानाः। पणयः। ससन्तु। रेवत्। उच्छ। मघवत्ऽभ्यः। मघोनि। रेवत्। स्तोत्रे। सूनृते। जारयन्ती ॥ १.१२४.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघोनि) उत्तम धनयुक्त (उषः) प्रभातवेला के तुल्य वर्त्तमान स्त्री ! तूँ जो (अबुध्यमानाः) अचेत नींद में डूबे हुए वा (पणयः) व्यवहारयुक्त प्राणी प्रभात समय वा दिन में (ससन्तु) सोवें उनकी (पृणतः) पालना करनेवाले पुष्ट प्राणियों को प्रातःसमय की वेला के प्रकाश के समान (प्र, बोधय) बोध करा। हे (मघोनि) अतीव धन इकट्ठा करनेवाली (सूनृते) उत्तम सत्यस्वभावयुक्त युवति ! तूँ प्रभात वेला के समान (जारयन्ती) अवस्था व्यतीत कराती हुई (मघवद्भ्यः) प्रशंसित धनवानों के लिये (रेवत्) उत्तम धनयुक्त व्यवहार जैसे हो, वैसे (स्तोत्रे) स्तुति प्रशंसा करनेवाले के लिये (रेवत्) स्थिर धन की (उच्छ) प्राप्ति करा ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। किसी को रात्रि के पिछले पहर में वा दिन में न सोना चाहिये क्योंकि नींद और दिन के घाम आदि की अधिक गरमी के योग से रोगों की उत्पत्ति होने से तथा काम और अवस्था की हानि से, जैसे पुरुषार्थ की युक्ति से बहुत धन को प्राप्त होता, वैसे सूर्योदय से पहिले उठ कर यत्नवान् पुरुष दरिद्रता का त्याग करता है ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।