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Rigveda Mandal 1 / Sukta 123 / Mantra 9

191 Sukta
13 Mantra
1/123/9
Devata- उषाः Rishi- दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जा॒न॒त्यह्न॑: प्रथ॒मस्य॒ नाम॑ शु॒क्रा कृ॒ष्णाद॑जनिष्ट श्विती॒ची। ऋ॒तस्य॒ योषा॒ न मि॑नाति॒ धामाह॑रहर्निष्कृ॒तमा॒चर॑न्ती ॥

जा॒न॒ती । अह्नः॑ । प्र॒थ॒मस्य॑ । नाम॑ । शु॒क्रा । कृ॒ष्णात् । अ॒ज॒नि॒ष्ट॒ । श्वि॒ती॒ची । ऋ॒तस्य॑ । योषा॑ । न । मि॒ना॒ति॒ । धाम॑ । अहः॑ऽअहः । निः॒ऽकृ॒तम् । आ॒ऽचर॑न्ती ॥

Mantra without Swara
जानत्यह्न: प्रथमस्य नाम शुक्रा कृष्णादजनिष्ट श्वितीची। ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्निष्कृतमाचरन्ती ॥

जानती। अह्नः। प्रथमस्य। नाम। शुक्रा। कृष्णात्। अजनिष्ट। श्वितीची। ऋतस्य। योषा। न। मिनाति। धाम। अहःऽअहः। निःऽकृतम्। आऽचरन्ती ॥ १.१२३.९

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्रि ! जैसे (प्रथमस्य) विस्तरित पहिले (अह्नः) दिन वा दिन के आदिम भाग का (नाम) नाम (जानती) जानती हुई (शुक्रा) शुद्धि करनेहारी (श्वितीची) सुपेदी को प्राप्त होती हुई प्रातःसमय की वेला (कृष्णात्) काले रङ्गवाले अन्धेरे से (अजनिष्ट) प्रसिद्ध होती है वा (ऋतस्य) सत्य आचरणयुक्त मनुष्य की (योषा) स्त्री के समान (अहरहः) दिन-दिन (आचरन्ती) आचरण करती हुई (निष्कृतम्) उत्पन्न हुए वा निश्चय को प्राप्त (धाम) स्थान को (न) नहीं (मिनाति) नष्ट करती, वैसी तूँ हो ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातःसमय की वेला अन्धकार से उत्पन्न होकर दिन को प्रसिद्ध करती है, दिन से विरोध करनेहारी नहीं होती वैसे स्त्री सत्य आचरण से तथा अपने माता, पिता और पति के कुल को उत्तम कीर्ति से प्रशस्त कर अपने श्वसुर और पति के प्रति उनके अप्रसन्न होने का व्यवहार कुछ न करे ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।