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Rigveda Mandal 1 / Sukta 123 / Mantra 8

191 Sukta
13 Mantra
1/123/8
Devata- उषाः Rishi- दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒दृशी॑र॒द्य स॒दृशी॒रिदु॒ श्वो दी॒र्घं स॑चन्ते॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑। अ॒न॒व॒द्यास्त्रिं॒शतं॒ योज॑ना॒न्येकै॑का॒ क्रतुं॒ परि॑ यन्ति स॒द्यः ॥

स॒ऽदृशीः॑ । अ॒द्य । स॒ऽदृशीः॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । श्वः । दी॒र्घम् । स॒च॒न्ते॒ । वरु॑णस्य । धाम॑ । अ॒न॒व॒द्याः । त्रिं॒शत॑म् । योज॑नानि । एका॑ऽएका । क्रतु॑म् । परि॑ । य॒न्ति॒ । स॒द्यः ॥

Mantra without Swara
सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम। अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परि यन्ति सद्यः ॥

सऽदृशीः। अद्य। सऽदृशीः। इत्। ऊँ इति। श्वः। दीर्घम्। सचन्ते। वरुणस्य। धाम। अनवद्याः। त्रिंशतम्। योजनानि। एकाऽएका। क्रतुम्। परि। यन्ति। सद्यः ॥ १.१२३.८

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (अद्य) आज के दिन (अनवद्याः) प्रशंसित (सदृशीः) एकसी (उ) अथवा तो (श्वः) अगले दिन (सदृशीः) एकसी रात्रि और प्रभात वेला (वरुणस्य) पवन के (दीर्घम्) बड़े समय वा (धाम) स्थान को (सचन्ते) संयोग को प्राप्त होती और (एकैका) उनमें से प्रत्येक (त्रिंशतम्, योजनानि) एकसौ बीस क्रोश और (क्रतुम्) कर्म को (सद्यः) शीघ्र (परि, यन्ति) पर्य्याय से प्राप्त होती हैं, वे (इत्) व्यर्थ किसी को न खोना चाहिये ॥ ८ ॥
Essence
जैसे ईश्वर के नियम को प्राप्त जो हो गये, होते और होनेवाले रात्रि-दिन हैं उनका अन्यथापन नहीं होता, वैसे ही इस सब संसार के क्रम का विपरीत भाव नहीं होता तथा जो मनुष्य आलस को छोड़ सृष्टिक्रम की अनुकूलता से अच्छा यत्न किया करते हैं, वे प्रशंसित विद्या और ऐश्वर्य्यवाले होते हैं और जैसे यह रात्रि दिन नियत समय आता और जाता वैसे ही मनुष्यों को व्यवहारों में सदा अपना वर्ताव रखना चाहिये ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।