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Rigveda Mandal 1 / Sukta 123 / Mantra 6

191 Sukta
13 Mantra
1/123/6
Devata- उषाः Rishi- दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उदी॑रतां सू॒नृता॒ उत्पुर॑न्धी॒रुद॒ग्नय॑: शुशुचा॒नासो॑ अस्थुः। स्पा॒र्हा वसू॑नि॒ तम॒साप॑गूळ्हा॒विष्कृ॑ण्वन्त्यु॒षसो॑ विभा॒तीः ॥

उत् । ई॒र॒ता॒म् । सू॒नृताः॑ । उत् । पुर॑म्ऽधीः । उत् । अ॒ग्नयः॑ । शु॒शु॒चा॒नासः॑ । अ॒स्थुः॒ । स्पा॒र्हा । वसू॑नि । तम॑सा । अप॑ऽगूळ्हा । आ॒विः । कृ॒ण्व॒न्ति॒ । उ॒षसः॑ । वि॒ऽभा॒तीः ॥

Mantra without Swara
उदीरतां सूनृता उत्पुरन्धीरुदग्नय: शुशुचानासो अस्थुः। स्पार्हा वसूनि तमसापगूळ्हाविष्कृण्वन्त्युषसो विभातीः ॥

उत्। ईरताम्। सूनृताः। उत्। पुरम्ऽधीः। उत्। अग्नयः। शुशुचानासः। अस्थुः। स्पार्हा। वसूनि। तमसा। अपऽगूळ्हा। आविः। कृण्वन्ति। उषसः। विऽभातीः ॥ १.१२३.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे सत्पुरुषो ! (सूनृताः) सत्यभाषणादि क्रियावान् होते हुए तुम लोग जैसे (पुरन्धीः) शरीर के आश्रित क्रिया को धारण करती और (शुशुचानासः) निरन्तर पवित्र करानेवाले (अग्नयः) अग्नियों के समान चमकती-दमकती हुई स्त्री लोग (उदीरताम्) उत्तमता में प्रेरणा देवें वा (स्पार्हा) चाहने योग्य (वसूनि) धन आदि पदार्थों को (उदस्थुः) उन्नति से प्राप्त हों वा जैसे (उषसः) प्रभातसमय (तमसा) अन्धकार में (अपगूढा) ढँपे हुए पदार्थों और (बिभातीः) अच्छे प्रकाशों को (उदाविष्कृण्वन्ति) ऊपर से प्रकट करते हैं, वैसे होओ ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब स्त्रीजन प्रभातसमय की वेलाओं के समान वर्त्तमान अविद्या, मैलापन आदि दोषों को निराले = दूर कर विद्या और पाकपन आदि गुणों को प्रकाश कर ऐश्वर्य्य की उन्नति करती हैं, तब वे निरन्तर सुखयुक्त होती हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।