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Rigveda Mandal 1 / Sukta 123 / Mantra 5

191 Sukta
13 Mantra
1/123/5
Devata- उषाः Rishi- दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भग॑स्य॒ स्वसा॒ वरु॑णस्य जा॒मिरुष॑: सूनृते प्रथ॒मा ज॑रस्व। प॒श्चा स द॑घ्या॒ यो अ॒घस्य॑ धा॒ता जये॑म॒ तं दक्षि॑णया॒ रथे॑न ॥

भग॑स्य । स्वसा॑ । वरु॑णस्य । जा॒मिः । उषः॑ । सू॒नृ॒ते॒ । प्र॒थ॒मा । ज॒र॒स्व॒ । प॒श्चा । सः । द॒ध्याः॒ । यः । अ॒घस्य॑ । धा॒ता । जये॑म । तम् । दक्षि॑णया । रथे॑न ॥

Mantra without Swara
भगस्य स्वसा वरुणस्य जामिरुष: सूनृते प्रथमा जरस्व। पश्चा स दघ्या यो अघस्य धाता जयेम तं दक्षिणया रथेन ॥

भगस्य। स्वसा। वरुणस्य। जामिः। उषः। सूनृते। प्रथमा। जरस्व। पश्चा। सः। दघ्याः। यः। अघस्य। धाता। जयेम। तम्। दक्षिणया। रथेन ॥ १.१२३.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 4 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे सूनृते ! सत्य आचरणयुक्त स्त्री तूँ (उषः) प्रातःसमय की वेला के समान वा (भगस्य) ऐश्वर्य्य की (स्वसा) बहिन के समान वा (वरुणस्य) उत्तम पुरुष की (जामिः) कन्या के समान (प्रथमा) प्रख्याति प्रशंसा को प्राप्त हुई विद्याओं की (जरस्व) स्तुति कर, (यः) जो (अघस्य) अपराध का (धाता) धारण करनेवाला हो (तम्) उसको (दक्षिणया) अच्छी सिखाई हुई सेना और (रथेन) विमान आदि यान से जैसे हम लोग (जयेम) जीतें वैसे तूँ (दघ्याः) उसका तिरस्कार कर, जो मनुष्य पापी हो (सः) वह (पश्चा) पीछा करने अर्थात् तिरस्कार करने योग्य है ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। स्त्रियों को चाहिये कि अपने-अपने घर में ऐश्वर्य की उन्नति श्रेष्ठ रीति और दुष्टों का ताड़न निरन्तर किया करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।