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Rigveda Mandal 1 / Sukta 123 / Mantra 13

191 Sukta
13 Mantra
1/123/13
Devata- उषाः Rishi- दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तस्य॑ र॒श्मिम॑नु॒यच्छ॑माना भ॒द्रम्भ॑द्रं॒ क्रतु॑म॒स्मासु॑ धेहि। उषो॑ नो अ॒द्य सु॒हवा॒ व्यु॑च्छा॒स्मासु॒ रायो॑ म॒घव॑त्सु च स्युः ॥

ऋ॒तस्य॑ । र॒श्मिम् । अ॒नु॒ऽयच्छ॑माना । भ॒द्रम्ऽभ॑द्रम् । क्रतु॑म् । अ॒स्मासु॑ । धे॒हि॒ । उषः॑ । नः॒ । अ॒द्य । सु॒ऽहवा॑ । वि । उ॒च्छ॒ । अ॒स्मासु॑ । रायः॑ । म॒घव॑त्ऽसु । च॒ । स्यु॒रिति॑ स्युः ॥

Mantra without Swara
ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रम्भद्रं क्रतुमस्मासु धेहि। उषो नो अद्य सुहवा व्युच्छास्मासु रायो मघवत्सु च स्युः ॥

ऋतस्य। रश्मिम्। अनुऽयच्छमाना। भद्रम्ऽभद्रम्। क्रतुम्। अस्मासु। धेहि। उषः। नः। अद्य। सुऽहवा। वि। उच्छ। अस्मासु। रायः। मघवत्ऽसु। च। स्युरिति स्युः ॥ १.१२३.१३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (उषः) प्रातःसमय की वेला सी अलबेली स्त्री ! तूँ (अद्य) आज जैसे (ऋतस्य) जल की (रश्मिम्) किरण को प्रभात समय की वेला स्वीकार करती वैसे मन से प्यारे पति को (अनुयच्छमाना) अनुकूलता से प्राप्त हुई (अस्मासु) हम लोगों में (भद्रंभद्रम्, क्रतुम्) अच्छी-अच्छी बुद्धि वा अच्छे-अच्छे काम को (धेहि) धर (सुहवा) और उत्तम सुख देनेवाली होती हुई (नः) हम लोगों को (व्युच्छ) ठहरा जिससे (मघवत्सु) प्रशंसित धनवाले (अस्मासु) हम लोगों में (रायः) शोभा (च) भी (स्युः) हों ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे श्रेष्ठ स्त्री अपने-अपने पति आदि की यथावत् सेवा कर बुद्धि, धर्म और ऐश्वर्य्य को नित्य बढ़ाती हैं, वैसे प्रभात समय की वेला भी हैं ॥ १३ ॥इस सूक्त में प्रभात समय की वेला के दृष्टान्त से स्त्रियों के धर्म का वर्णन करने से इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की पिछले सूक्त में कहे अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये ॥यह १२३ वाँ सूक्त और ६ छठा वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।