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Rigveda Mandal 1 / Sukta 123 / Mantra 11

191 Sukta
13 Mantra
1/123/11
Devata- उषाः Rishi- दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒सं॒का॒शा मा॒तृमृ॑ष्टेव॒ योषा॒विस्त॒न्वं॑ कृणुषे दृ॒शे कम्। भ॒द्रा त्वमु॑षो वित॒रं व्यु॑च्छ॒ न तत्ते॑ अ॒न्या उ॒षसो॑ नशन्त ॥

सु॒ऽस॒ङ्का॒शा । मा॒तृमृ॑ष्टाऽइव । योषा॑ । आ॒विः । त॒न्व॑म् । कृ॒णु॒षे॒ । दृ॒शे । कम् । भ॒द्रा । त्वम् । उ॒षः॒ । वि॒ऽत॒रम् । वि । उ॒च्छ॒ । न । तत् । ते॒ । अ॒न्याः । उ॒षसः॑ । न॒श॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
सुसंकाशा मातृमृष्टेव योषाविस्तन्वं कृणुषे दृशे कम्। भद्रा त्वमुषो वितरं व्युच्छ न तत्ते अन्या उषसो नशन्त ॥

सुऽसङ्काशा। मातृमृष्टाऽइव। योषा। आविः। तन्वम्। कृणुषे। दृशे। कम्। भद्रा। त्वम्। उषः। विऽतरम्। वि। उच्छ। न। तत्। ते। अन्याः। उषसः। नशन्त ॥ १.१२३.११

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे कन्या ! (सुसंकाशा) अच्छी सिखावट से सिखाई हुई (योषा) युवति (मातृमृष्टेव) पढ़ी हुई पण्डिता माता ने सत्यशिक्षा देकर शुद्ध की सी जो (दृशे) देखने को (तन्वम्) अपने शरीर को (आविः) प्रकट (कृणुषे) करती (भद्रा) और मङ्गलरूप आचरण करती हुई (कम्) सुखस्वरूप पति को प्राप्त होती है सो (त्वम्) तूँ (वितरम्) सुख देनेवाले पदार्थ और सुख को (व्युच्छ) स्वीकार कर, हे (उषः) प्रभात वेला के समान वर्त्तमान स्त्री ! जैसे (अन्याः) और (उषसः) प्रभात समय (न) नहीं (नशन्त) विनाश को प्राप्त होते वैसे (ते) तेरा (तत्) उक्त सुख न विनाश को प्राप्त हो ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रातःकाल की वेला नियम से अपने अपने समय और देश को प्राप्त होती है, वैसे स्त्री अपने-अपने पति को पा कर ऋतुधर्म को प्राप्त होवें ॥ ११ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।