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Rigveda Mandal 1 / Sukta 122 / Mantra 9

191 Sukta
15 Mantra
1/122/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जनो॒ यो मि॑त्रावरुणावभि॒ध्रुग॒पो न वां॑ सु॒नोत्य॑क्ष्णया॒ध्रुक्। स्व॒यं स यक्ष्मं॒ हृद॑ये॒ नि ध॑त्त॒ आप॒ यदीं॒ होत्रा॑भिर्ऋ॒तावा॑ ॥

जनः॑ । यः । मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ॒ । अ॒भि॒ऽध्रुक् । अ॒पः । न । वा॒म् । सु॒नोति॑ । अ॒क्ष्ण॒या॒ऽध्रुक् । स्व॒यम् । सः । यक्ष्म॑म् । हृद॑ये । नि । ध॒त्त॒ । आप॑ । यत् । ई॒म् । होत्रा॑भिः । ऋ॒तऽवा॑ ॥

Mantra without Swara
जनो यो मित्रावरुणावभिध्रुगपो न वां सुनोत्यक्ष्णयाध्रुक्। स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदीं होत्राभिर्ऋतावा ॥

जनः। यः। मित्रावरुणौ। अभिऽध्रुक्। अपः। न। वाम्। सुनोति। अक्ष्णयाऽध्रुक्। स्वयम्। सः। यक्ष्मम्। हृदये। नि। धत्त। आप। यत्। ईम्। होत्राभिः। ऋतऽवा ॥ १.१२२.९

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सत्य उपदेश और यज्ञ करानेवालो ! (यः) जो (जनः) विद्वान् (वाम्) तुम दोनों के (अपः) प्राण अर्थात् बलों को (मित्रावरुणा) प्राण तथा उदान जैसे वैसे (अभिध्रुक्) आगे से द्रोह करता वा (अक्ष्णयाध्रुक्) कुटिलरीति से द्रोह करता हुआ (न) नहीं (सुनोति) उत्पन्न करता (सः) वह (स्वयम्) आप (हृदये) अपने हृदय में (यक्ष्मम्) राजरोग को (नि, धत्ते) निरन्तर धारण करता वा (यत्) जो (ऋतावा) सत्य भाव से सेवन करनेवाला (होत्राभिः) ग्रहण करने योग्य क्रियाओं से (ईम्) सब ओर से आपके व्यवहारों को प्राप्त होता है, वह (आप) अपने हृदय में सुख को निरन्तर धारण करता है ॥ ९ ॥
Essence
जो मनुष्य परोपकार करनेवाले विद्वानों से द्रोह करता वह सदा दुःखी और जो प्रीति करता है, वह सुखी होता है ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।