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Rigveda Mandal 1 / Sukta 122 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/122/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्तु॒षे सा वां॑ वरुण मित्र रा॒तिर्गवां॑ श॒ता पृ॒क्षया॑मेषु प॒ज्रे। श्रु॒तर॑थे प्रि॒यर॑थे॒ दधा॑नाः स॒द्यः पु॒ष्टिं नि॑रुन्धा॒नासो॑ अग्मन् ॥

स्तु॒षे । सा । वा॒म् । व॒रु॒ण॒ । मि॒त्र॒ । रा॒तिः । गवा॑म् । श॒ता । पृ॒क्षऽया॑मेषु । प॒ज्रे । श्रु॒तऽर॑थे । प्रि॒यऽर॑थे । दधा॑नाः । स॒द्यः । पु॒ष्टिम् । नि॒ऽरु॒न्धा॒नासः॑ । अ॒ग्म॒न् ॥

Mantra without Swara
स्तुषे सा वां वरुण मित्र रातिर्गवां शता पृक्षयामेषु पज्रे। श्रुतरथे प्रियरथे दधानाः सद्यः पुष्टिं निरुन्धानासो अग्मन् ॥

स्तुषे। सा। वाम्। वरुण। मित्र। रातिः। गवाम्। शता। पृक्षऽयामेषु। पज्रे। श्रुतऽरथे। प्रियऽरथे। दधानाः। सद्यः। पुष्टिम्। निऽरुन्धानासः। अग्मन् ॥ १.१२२.७

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे विद्वान् जन ! (पज्रे) पदार्थों के पहुँचानेवाले (श्रुतरथे) सुने हुए रमण करने योग्य रथ वा (प्रियरथे) अति मनोहर रथ में (सद्यः) शीघ्र (पुष्टिम्) पुष्टि को (दधानाः) धारण करते और दुःख को (निरुन्धानासः) रोकते हुए (अग्मन्) जावें, वैसे हे (वरुण) गुणों से उत्तमता को प्राप्त और (मित्र) मित्र तुम (पृक्षयामेषु) जो पूँछे जाते उनके यम-नियमों में (गवां, शता) सैकड़ों वचनों को प्राप्त होओ। और जो तुम्हारी (रातिः) दान देनेवाली स्त्री है (सा) वह (वाम्) तुम दोनों की (स्तुषे) स्तुति करती है, वैसे मैं भी स्तुति करूँ ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में विद्वान् जन पुरुषार्थ से अनेकों अद्भुत यानों को बनाते हैं, वैसे औरों को भी बनाने चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।