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Rigveda Mandal 1 / Sukta 122 / Mantra 4

191 Sukta
15 Mantra
1/122/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒त त्या मे॑ य॒शसा॑ श्वेत॒नायै॒ व्यन्ता॒ पान्तौ॑शि॒जो हु॒वध्यै॑। प्र वो॒ नपा॑तम॒पां कृ॑णुध्वं॒ प्र मा॒तरा॑ रास्पि॒नस्या॒योः ॥

उ॒त । त्या । मे॒ । य॒शसा॑ । श्वे॒त॒नायै॑ । व्यन्ता॑ । पान्ता॑ । औ॒शि॒जः॒ । हु॒वध्यै॑ । प्र । वः॒ । नपा॑तम् । अ॒पाम् । कृ॒णु॒ध्व॒म् । प्र । मा॒तरा॑ । रा॒स्पि॒नस्य॑ । आ॒योः ॥

Mantra without Swara
उत त्या मे यशसा श्वेतनायै व्यन्ता पान्तौशिजो हुवध्यै। प्र वो नपातमपां कृणुध्वं प्र मातरा रास्पिनस्यायोः ॥

उत। त्या। मे। यशसा। श्वेतनायै। व्यन्ता। पान्ता। औशिजः। हुवध्यै। प्र। वः। नपातम्। अपाम्। कृणुध्वम्। प्र। मातरा। रास्पिनस्य। आयोः ॥ १.१२२.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (मे) मेरे (यशसा) उत्तम यश से (श्वेतनायै) प्रकाश के लिये (व्यन्ता) अनेक प्रकार के बल से युक्त (पान्ता) रक्षा करनेवाले (त्या) वे पूर्वोक्त पढ़ाने और उपदेश करनेहारे (हुवध्यै) हम लोगों के ग्रहण करने को (मातरा) मान करनेहारे (रास्पिनस्य) ग्रहण करने योग्य (आयोः) जीवन अर्थात् आयुर्दा के बढ़ाने को (प्र) प्रवृत्त होते हैं तथा जैसे तुम लोग (अपाम्) जलों के (नपातम्) विनाशरहित मार्ग को वा जलों के न गिरने को (प्र, कृणुध्वम्) सिद्ध करो वैसे (उत) निश्चय से (औशिजः) कामना करते हुए का सन्तान मैं (वः) तुम लोगों की आयुर्दा को निरन्तर बढ़ाऊँ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सुन्दर शिक्षा से हम लोगों की आयुर्दा को तुम बढ़ाओ, वैसे हम भी तुम्हारी आयुर्दा की उन्नति किया करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।