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Rigveda Mandal 1 / Sukta 122 / Mantra 3

191 Sukta
15 Mantra
1/122/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कक्षीवान् Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म॒मत्तु॑ न॒: परि॑ज्मा वस॒र्हा म॒मत्तु॒ वातो॑ अ॒पां वृष॑ण्वान्। शि॒शी॒तमि॑न्द्रापर्वता यु॒वं न॒स्तन्नो॒ विश्वे॑ वरिवस्यन्तु दे॒वाः ॥

म॒मत्तु॑ । नः॒ । परि॑ऽज्मा । व॒स॒र्हा । म॒मत्तु॑ । वातः॑ । अ॒पाम् । वृष॑ण्ऽवान् । शि॒शी॒तम् । इ॒न्द्रा॒प॒र्व॒ता॒ । यु॒वम् । नः॒ । तत् । नः॒ । विश्वे॑ । व॒रि॒व॒स्य॒न्तु॒ । दे॒वाः ॥

Mantra without Swara
ममत्तु न: परिज्मा वसर्हा ममत्तु वातो अपां वृषण्वान्। शिशीतमिन्द्रापर्वता युवं नस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः ॥

ममत्तु। नः। परिऽज्मा। वसर्हा। ममत्तु। वातः। अपाम्। वृषण्ऽवान्। शिशीतम्। इन्द्रापर्वता। युवम्। नः। तत्। नः। विश्वे। वरिवस्यन्तु। देवाः ॥ १.१२२.३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (वसर्हा) निवास कराने की योग्यता को प्राप्त होता और (परिज्मा) पाये हुए पदार्थों को सब ओर से खाता जलाता हुआ अग्नि (नः) हम लोगों को (ममत्तु) आनन्दित करावे वा (अपाम्) जलों की (वृषण्वान्) वर्षा करानेहारा (वातः) पवन हम लोगों को (ममत्तु) आनन्दयुक्त करावे। हे (इन्द्रापर्वता) सूर्य्य और मेघ के समान वर्त्तमान पढ़ाने और उपदेश करनेवालो ! (युवम्) तुम दोनों (नः) हम लोगों को (शिशीतम्) अतितीक्ष्ण बुद्धि से युक्त करो वा (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (नः) हम लोगों के लिये (वरिवस्यन्तु) सेवन अर्थात् आश्रय करें, वैसे (तत्) उन सबको सत्कारयुक्त हम लोग निरन्तर करें ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य जैसे हम लोगों को प्रसन्न करें, वैसे हम लोग भी उन मनुष्यों को प्रसन्न करें ॥ ३ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में अच्छे गुणों के विचार और व्यवहार का उपदेश करते हैं ।