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Rigveda Mandal 1 / Sukta 122 / Mantra 2

191 Sukta
15 Mantra
1/122/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पत्नी॑व पू॒र्वहू॑तिं वावृ॒धध्या॑ उ॒षासा॒नक्ता॑ पुरु॒धा विदा॑ने। स्त॒रीर्नात्कं॒ व्यु॑तं॒ वसा॑ना॒ सूर्य॑स्य श्रि॒या सु॒दृशी॒ हिर॑ण्यैः ॥

पत्नी॑ऽइव । पू॒र्वऽहू॑तिम् । व॒वृ॒धध्यै॑ । उ॒षसा॒नक्ता॑ । पु॒रु॒धा । विदा॑ने॒ इति॑ । स्त॒रीः । न । अत्क॑म् । विऽउ॑तम् । वसा॑ना । सूर्य॑स्य । श्रि॒या । सु॒ऽदृशी॑ । हिर॑ण्यैः ॥

Mantra without Swara
पत्नीव पूर्वहूतिं वावृधध्या उषासानक्ता पुरुधा विदाने। स्तरीर्नात्कं व्युतं वसाना सूर्यस्य श्रिया सुदृशी हिरण्यैः ॥

पत्नीऽइव। पूर्वऽहूतिम्। ववृधध्यै। उषसानक्ता। पुरुधा। विदाने इति। स्तरीः। न। अत्कम्। विऽउतम्। वसाना। सूर्यस्य। श्रिया। सुऽदृशी। हिरण्यैः ॥ १.१२२.२

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे सरलस्वभावयुक्त उत्तम स्त्री ! तू (पत्नीव) जैसे यज्ञादि कर्म में साथ रहनेवाली विद्वान् की स्त्री (ववृधध्यै) वृद्धि करने को अर्थात् गृहस्थाश्रम आदि व्यवहारों के बढ़ाने को (पूर्वहूतिम्) जिसका पहिले बुलाना होता अर्थात् सब कामों से जिसकी प्रथम सेवा करनी होती उस अपने पति को स्वीकार कर (पुरुधा) जो बहुत व्यवहार वा पदार्थों की धारणा करनेहारे (विदाने) जाने जाते उन (उषासानक्ता) रात्रिदिन के समान वर्त्ते वैसी वर्त्ता कर तथा (सूर्यस्य) सूर्यमण्डल की (हिरण्यैः) सुवर्ण सी चिलकती हुई ज्योतियों और (श्रिया) उत्तम शोभा से (सुदृशी) जिस तेरा अच्छा दर्शन वह (अत्कम्) कुएं के समान (व्युतम्) अनेक प्रकार बुने हुए विस्तारयुक्त वस्त्र को (वसाना) पहिनती हुई (स्तरीः) जैसे कलायन्त्रादिकों के संयोग से ढाँपी हुई नाव हों (न) वैसी निरन्तर हो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पतिव्रता स्त्री विद्यमान अपने पति को प्रसन्न करती और स्त्रीव्रत अर्थात् नियम से अपनी स्त्री में रमनेहारा पति जैसे दिन-रात्रि सम्बन्ध से मिला हुआ वर्त्तमान है, वैसे सम्बन्ध से वर्त्तमान कपड़े और गहने पहिने हुए सुशोभित धर्मयुक्त व्यवहार में यथावत् प्रयत्न करे ॥ २ ॥
Subject
अब स्त्री-पुरुषों के व्यवहार को अगले मन्त्र में कहा है ।