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Rigveda Mandal 1 / Sukta 122 / Mantra 11

191 Sukta
15 Mantra
1/122/11
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध॒ ग्मन्ता॒ नहु॑षो॒ हवं॑ सू॒रेः श्रोता॑ राजानो अ॒मृत॑स्य मन्द्राः। न॒भो॒जुवो॒ यन्नि॑र॒वस्य॒ राध॒: प्रश॑स्तये महि॒ना रथ॑वते ॥

अध॑ । ग्मन्त॑ । नहु॑षः॑ । हव॑म् । सू॒रेः । श्रोत॑ । रा॒जा॒नः॒ । अ॒मृत॑स्य । म॒न्द्राः॒ । न॒भः॒ऽजुवः॑ । यत् । नि॒र॒वस्य॑ । राधः॑ । प्रऽश॑स्तये । म॒हि॒ना । रथ॑ऽवते ॥

Mantra without Swara
अध ग्मन्ता नहुषो हवं सूरेः श्रोता राजानो अमृतस्य मन्द्राः। नभोजुवो यन्निरवस्य राध: प्रशस्तये महिना रथवते ॥

अध। ग्मन्त। नहुषः। हवम्। सूरेः। श्रोत। राजानः। अमृतस्य। मन्द्राः। नभःऽजुवः। यत्। निरवस्य। राधः। प्रऽशस्तये। महिना। रथऽवते ॥ १.१२२.११

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मन्द्राः) आनन्द करानेवाले (राजानः) प्रकाशमान सज्जनो ! तुम (अमृतस्य) आत्मरूप से मरण धर्म रहित (सूरेः) समस्त विद्याओं को जाननेवाले (नहुषः) विद्वान् जन के (हवम्) उपदेश को (श्रोत) सुनो (नभोजुवः) विमान आदि से आकाश में गमन करते हुए तुम (यत्) जो (निरवस्य) रक्षा हीन का (राधः) धन है उसको (ग्मन्त) प्राप्त होओ (अध) उसके अनन्तर (महिना) बड़प्पन से (प्रशस्तये) प्रशंसित (रथवते) बहुत रथवाले को धन देओ ॥ ११ ॥
Essence
जो परमेश्वर, परम विद्वान् और अपने आत्मा के सकाश से विरोधी नहीं होते और उनके उपदेशों का ग्रहण करें, वे विद्याओं को प्राप्त हुए महाशय होते हैं ॥ ११ ॥
Subject
फिर उपदेश करनेवाले का कर्त्तव्य अगले मन्त्र में कहा है ।