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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 9

191 Sukta
15 Mantra
1/121/9
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वमा॑य॒सं प्रति॑ वर्तयो॒ गोर्दि॒वो अश्मा॑न॒मुप॑नीत॒मृभ्वा॑। कुत्सा॑य॒ यत्र॑ पुरुहूत व॒न्वञ्छुष्ण॑मन॒न्तैः प॑रि॒यासि॑ व॒धैः ॥

त्वम् । आ॒य॒सम् । प्रति॑ । व॒र्त॒यः॒ । गोः । दि॒वः । अश्मा॑नम् । उप॑ऽनीतम् । ऋभ्वा॑ । कुत्सा॑य । यत्र॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । व॒न्वन् । शुष्ण॑म् । अ॒न॒न्तैः । प॒रि॒ऽयासि॑ । व॒धैः ॥

Mantra without Swara
त्वमायसं प्रति वर्तयो गोर्दिवो अश्मानमुपनीतमृभ्वा। कुत्साय यत्र पुरुहूत वन्वञ्छुष्णमनन्तैः परियासि वधैः ॥

त्वम्। आयसम्। प्रति। वर्तयः। गोः। दिवः। अश्मानम्। उपऽनीतम्। ऋभ्वा। कुत्साय। यत्र। पुरुऽहूत। वन्वन्। शुष्णम्। अनन्तैः। परिऽयासि। वधैः ॥ १.१२१.९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वन्वन्) अच्छे प्रकार सेवन करते और (पुरुहूत) बहुत मनुष्यों से ईर्ष्या के साथ बुलाये हुए मनुष्य ! (त्वम्) तू जैसे सूर्य (दिवः) दिव्य सुख देनेहारे प्रकाश से अन्धकार को दूर करके (अश्मानम्) व्याप्त होनेवाले (उपनीतम्) अपने समीप आये हुए मेघ को छिन्न-भिन्नकर संसार में पहुँचाता है, वैसे (ऋभ्वा) मेधावी अर्थात् धीरबुद्धि वाले पुरुष के साथ (आयसम्) लोहे से बनाये हुए शस्त्र-अस्त्रों को लेके (कुत्साय) वज्र के लिये (शुष्णम्) शत्रुओं के पराक्रम को सुखानेहारे बल को धारण करता हुआ (यत्र) जहाँ गौओं के मारनेवाले हैं, वहाँ उनको (अनन्तैः) जिनकी संख्या नहीं उन (वधैः) गोहिंसकों को मारने के उपायों से (परियासि) सब ओर से प्राप्त होते हो, उनको (गोः) गौ आदि पशुओं के समीप से (प्रति, वर्त्तयः) लौटाओ भी ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे सूर्य मेघ की वर्षा और अन्धकार को दूर कर सबको हर्ष आनन्दयुक्त करता है, वैसे गौ आदि पशुओं की रक्षा कर उनके मारनेवालों को रोक निरन्तर सुखी होओ। यह काम बुद्धिमानों के सहाय के विना होने को संभव नहीं है, इससे बुद्धिमानों के सहाय से ही उक्त काम का आचरण करो ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।