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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/121/8
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ष्टा म॒हो दि॒व आदो॒ हरी॑ इ॒ह द्यु॑म्ना॒साह॑म॒भि यो॑धा॒न उत्स॑म्। हरिं॒ यत्ते॑ म॒न्दिनं॑ दु॒क्षन्वृ॒धे गोर॑भस॒मद्रि॑भिर्वा॒ताप्य॑म् ॥

अ॒ष्टा । म॒हः । दि॒वः । आदः॑ । हरी॒ इति॑ । इ॒ह । द्यु॑म्न॒ऽसह॑म् । अ॒भि । यो॒धा॒नः । उत्स॑म् । हरि॑म् । यत् । ते॒ । म॒न्दिन॑म् । धु॒क्षन् । वृ॒धे । गोऽर॑भसम् । अद्रि॑ऽभिः । वा॒ताप्य॑म् ॥

Mantra without Swara
अष्टा महो दिव आदो हरी इह द्युम्नासाहमभि योधान उत्सम्। हरिं यत्ते मन्दिनं दुक्षन्वृधे गोरभसमद्रिभिर्वाताप्यम् ॥

अष्टा। महः। दिवः। आदः। हरी इति। इह। द्युम्नऽसहम्। अभि। योधानः। उत्सम्। हरिम्। यत्। ते। मन्दिनम्। धुक्षन्। वृधे। गोऽरभसम्। अद्रिऽभिः। वाताप्यम् ॥ १.१२१.८

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (ते) तुम्हारे (यत्) जो (योधानः) युद्ध करनेवाले (वृधे) सुखों के बढ़ने के लिये जैसे (आदः) रस आदि पदार्थ का भक्षण करने और (अष्टा) सब जगह व्याप्त होनेवाला सूर्यलोक (महः) बड़ी (दिवः) दीप्ति से अपने (हरी) प्रकाश और आकर्षण को (अद्रिभिः) मेघ वा पर्वतों के साथ प्रचरित करता है, वैसे (इह) इस संसार में (उत्सम्) कुएँ को बनाय (द्युम्नसाहम्) जिससे धन सहे जाते अर्थात् मिलते उस (हरिम्) घोड़ा और (मन्दिनम्) मनोहर (वाताप्यम्) शुद्ध वायु से पाने योग्य (गोरभसम्) गौओं के बड़प्पन को (अभि, दुक्षन्) सब प्रकार से पूर्ण करें, वे आपको सत्कार करने योग्य हैं ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम जैसे सूर्य्य अपने प्रकाश से सब जगत् को आनन्द देकर अपनी आकर्षण शक्ति से भूगोल का धारण करता है, वैसे ही नदी, सोता, कुआँ, बावरी, तालाब आदि को बनाकर वन वा पर्वतों में घास आदि को बढ़ा, गौ और घोड़े आदि पशुओं की रक्षा और वृद्धि कर, दूध आदि के सेवन से निरन्तर आनन्द को प्राप्त होओ ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।