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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/121/7
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्वि॒ध्मा यद्व॒नधि॑तिरप॒स्यात्सूरो॑ अध्व॒रे परि॒ रोध॑ना॒ गोः। यद्ध॑ प्र॒भासि॒ कृत्व्याँ॒ अनु॒ द्यूनन॑र्विशे प॒श्विषे॑ तु॒राय॑ ॥

सु॒ऽइ॒ध्मा । यत् । व॒नऽधि॑तिः । अ॒प॒स्यात् । सूरः॑ । अ॒ध्व॒रे । परि॑ । रोध॑ना । गोः । यत् । ह॒ । प्र॒ऽभासि॑ । कृत्व्या॑न् । अनु॑ । द्यून् । अन॑र्विशे । प॒शु॒ऽइषे॑ । तु॒राय॑ ॥

Mantra without Swara
स्विध्मा यद्वनधितिरपस्यात्सूरो अध्वरे परि रोधना गोः। यद्ध प्रभासि कृत्व्याँ अनु द्यूननर्विशे पश्विषे तुराय ॥

सुऽइध्मा। यत्। वनऽधितिः। अपस्यात्। सूरः। अध्वरे। परि। रोधना। गोः। यत्। ह। प्रऽभासि। कृत्व्यान्। अनु। द्यून्। अनर्विशे। पशुऽइषे। तुराय ॥ १.१२१.७

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 2

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Meaning
हे सज्जन मनुष्य ! तूने (यत्) जो ऐसी उत्तम क्रिया कि (स्विध्मा) जिससे सुन्दर सुख का प्रकाश होता वह (वनधितिः) वनों की धारणा अर्थात् रक्षा किई और जो (गोः) गौ की (रोधना) रक्षा होने के अर्थ काम किये हैं उनसे तू (अध्वरे) जिसमें हिंसा आदि दुःख नहीं हैं उस रक्षा के निमित्त (कृत्व्यान्) उत्तम कामों का (अनु, द्यून्) प्रतिदिन (सूरः) प्रेरणा देनेवाले सूर्यलोक के समान (अनर्विशे) लढ़ा आदि गाड़ियों में जो बैठना होता उसके लिये और (पश्विषे) पशुओं के बढ़ने की इच्छा के लिये और (तुराय) शीघ्र जाने के लिये (यत्) जो (ह) निश्चय से (प्रभासि) प्रकाशित होता है सो आप (पर्यपस्यात्) अपने को उत्तम-उत्तम कामों की इच्छा करो ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य पशुओं की रक्षा और बढ़ने आदि के लिये वनों को राख, उन्हीं में उन पशुओं को चरा, दूध आदि का सेवन कर खेती आदि कामों को यथावत् करें, वे राज्य के ऐश्वर्य से सूर्य के समान प्रकाशमान होते हैं और गौ आदि पशुओं के मारनेवाले नहीं ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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