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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 6

191 Sukta
15 Mantra
1/121/6
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध॒ प्र ज॑ज्ञे त॒रणि॑र्ममत्तु॒ प्र रो॑च्य॒स्या उ॒षसो॒ न सूर॑:। इन्दु॒र्येभि॒राष्ट॒ स्वेदु॑हव्यैः स्रु॒वेण॑ सि॒ञ्चञ्ज॒रणा॒भि धाम॑ ॥

अध॑ । प्र । ज॒ज्ञे॒ । त॒रणिः॑ । म॒म॒त्तु॒ । प्र । रो॒चि॒ । अ॒स्याः । उ॒षसः॑ । न । सूरः॑ । इन्दुः॑ । येभिः॑ । आष्ट॑ । स्वऽइदु॑हव्यैः । स्रु॒वेण॑ । सि॒ञ्चन् । ज॒रणा॑ । अ॒भि । धाम॑ ॥

Mantra without Swara
अध प्र जज्ञे तरणिर्ममत्तु प्र रोच्यस्या उषसो न सूर:। इन्दुर्येभिराष्ट स्वेदुहव्यैः स्रुवेण सिञ्चञ्जरणाभि धाम ॥

अध। प्र। जज्ञे। तरणिः। ममत्तु। प्र। रोचि। अस्याः। उषसः। न। सूरः। इन्दुः। येभिः। आष्ट। स्वऽइदुहव्यैः। स्रुवेण। सिञ्चन्। जरणा। अभि। धाम ॥ १.१२१.६

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे अच्छे कामों के अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य ! आप (उषसः) प्रभात समय से (सूरः) सूर्य के (न) समान (येभिः) जिनसे (स्वेदुहव्यैः) अपने देने-लेने के योग्य दूध आदि पदार्थों से ऐश्वर्य्य अर्थात् उत्तम पदार्थ सिद्ध होते हैं उनसे और (स्रुवेण) श्रुवा आदि के योग से (धाम) यज्ञभूमि को (अभिसिञ्चन्) सब ओर से सींचते हुए सज्जनों के समान (अस्याः) इन गौ के दूध आदि पदार्थों से (प्र, रोचि) संसार में भली-भाँति प्रकाशमान हो और (इन्दु) ऐश्वर्य्ययुक्त (जरणा) प्रशंसित कामों को (आष्ट) प्राप्त हो (तरणिः) दुःख से पार पहुँचे हुए सुख का विस्तार करने अर्थात् बढ़ानेवाले आप (ममत्तु) आनन्द भोगो, (अध) इसके अनन्तर (प्र, जज्ञे) प्रसिद्ध होओ ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य गौ आदि पशुओं को राख और उनकी वृद्धि कर वैद्यकशास्त्र के अनुसार इन पशुओं से दूध आधि को सेवते हुए बलिष्ठ और अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त निरन्तर हों, जैसे कोई हल, पटेला आदि साधनों से युक्ति के साथ खेत को सिद्ध कर जल से सींचता हुआ अन्न आदि पदार्थों से युक्त होकर बल और ऐश्वर्य्य से सूर्य्य के समान प्रकाशमान होता है, वैसे इन प्रशंसा योग्य कामों को करते हुए प्रकाशित हों ॥ ६ ॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे वर्त्ते, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।