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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 4

191 Sukta
15 Mantra
1/121/4
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्य मदे॑ स्व॒र्यं॑ दा ऋ॒तायापी॑वृतमु॒स्रिया॑णा॒मनी॑कम्। यद्ध॑ प्र॒सर्गे॑ त्रिक॒कुम्नि॒वर्त॒दप॒ द्रुहो॒ मानु॑षस्य॒ दुरो॑ वः ॥

अ॒स्य । मदे॑ । स्व॒र्य॑म् । दाः॒ । ऋ॒ताय॑ । अपि॑ऽवृतम् । उ॒स्रिया॑णाम् । अनी॑कम् । यत् । ह॒ । प्र॒ऽसर्गे॑ । त्रि॒ऽक॒कुप् । नि॒ऽवर्त॑त् । अप॑ । द्रुहः॑ । मानु॑षस्य । दुरः॑ । व॒रिति॑ ॥

Mantra without Swara
अस्य मदे स्वर्यं दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम्। यद्ध प्रसर्गे त्रिककुम्निवर्तदप द्रुहो मानुषस्य दुरो वः ॥

अस्य। मदे। स्वर्यम्। दाः। ऋताय। अपिऽवृतम्। उस्रियाणाम्। अनीकम्। यत्। ह। प्रऽसर्गे। त्रिऽककुप्। निऽवर्तत्। अप। द्रुहः। मानुषस्य। दुरः। वरिति ॥ १.१२१.४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 24 Mantra » 4

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Meaning
(यत्) जो (त्रिककुप्) मनुष्य ऐसा है कि जिसकी पूर्व आदि दिशा सेना वा पढ़ाने और उपदेश करनेवालों से युक्त हैं (अस्य) इस प्रत्यक्ष (मानुषस्य) मनुष्य के (उस्रियाणाम्) गौओं के (प्रसर्गे) उत्तमता से उत्पन्न कराने रूप (मदे) आनन्द के निमित्त (ऋताय) सत्य व्यवहार वा जल के लिये (अपीवृतम्) सुख और बलों से युक्त (स्वर्य्यम्) विद्या और अच्छी शिक्षा रूप वचनों में श्रेष्ठ (अनीकम्) सेना को (दाः) देवे तथा इन (द्रुहः) गो आदि पशुओं के द्रोही अर्थात् मारनेहारे पशुहिंसक मनुष्यों को (निवर्त्तत्) रोके, हिंसा न होने दे, (दुरः) उक्त दुष्टों के द्वारे (अप, वः) बन्द कर देवे (ह) वही चक्रवर्त्ती राजा होने को योग्य है ॥ ४ ॥
Essence
वे ही राजपुरुष उत्तम होते हैं, जो प्रजास्थ मनुष्य और गौ आदि प्राणियों के सुख के लिये हिंसक दुष्ट पुरुषों की निवृत्ति कर धर्म में प्रकाशमान होते और जो परोपकारी होते हैं। जो अधर्म मार्गों को रोक धर्ममार्गों को प्रकाशित करते हैं, वे ही राजकामों के योग्य होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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