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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 2

191 Sukta
15 Mantra
1/121/2
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्तम्भी॑द्ध॒ द्यां स ध॒रुणं॑ प्रुषायदृ॒भुर्वाजा॑य॒ द्रवि॑णं॒ नरो॒ गोः। अनु॑ स्व॒जां म॑हि॒षश्च॑क्षत॒ व्रां मेना॒मश्व॑स्य॒ परि॑ मा॒तरं॒ गोः ॥

स्तम्भी॑त् । ह॒ । द्याम् । सः । ध॒रुण॑म् । प्रु॒षा॒य॒त् । ऋ॒भुः । वाजा॑य । द्रवि॑णन् । नरः॑ । गोः । अनु॑ । स्व॒ऽजाम् । म॒हि॒षः । च॒क्ष॒त॒ । व्राम् । मेना॑म् । अश्व॑स्य । परि॑ । मा॒तर॑म् । गोः ॥

Mantra without Swara
स्तम्भीद्ध द्यां स धरुणं प्रुषायदृभुर्वाजाय द्रविणं नरो गोः। अनु स्वजां महिषश्चक्षत व्रां मेनामश्वस्य परि मातरं गोः ॥

स्तम्भीत्। ह। द्याम्। सः। धरुणम्। प्रुषायत्। ऋभुः। वाजाय। द्रविणन्। नरः। गोः। अनु। स्वऽजाम्। महिषः। चक्षत। व्राम्। मेनाम्। अश्वस्य। परि। मातरम्। गोः ॥ १.१२१.२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 24 Mantra » 2

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Meaning
जैसे (महिषः) बड़ा सूर्य्य (गौः) भूमि का धारण करनेवाला है, वैसे (ऋभुः) सकल विद्याओं से युक्त आप्तबुद्धि मेधावी (नरः) धर्म विद्या की प्राप्ति करानेवाला सज्जन (वाजाय) विज्ञान वा अन्न के लिये (अश्वस्य) व्याप्त होने योग्य राज्य की (स्वजाम्) आपसे उत्पन्न की गई (व्राम्) स्वीकार करने के योग्य (मातरम्) माता के समान पालनेवाली (मेनाम्) विद्या और अच्छी शिक्षा से पाई हुई वाणी को (परि, चक्षत) सब ओर से कहे वा जैसे सूर्य्य (द्याम्) प्रकाश को (स्तम्भीत्) धारण करे वैसे (स, ह) वही (गोः) पृथिवी पर (द्रविणम्) धन को बढ़ा खेत को (धरुणम्) जल के समान (अनु, प्रुषायत्) सींचा करें ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो आप्त अर्थात् उत्तम शास्त्री विद्वान् के सङ्ग से विद्या, विनय और न्याय आदि का धारण करे वह सुख से बढ़े और बड़ा सत्कार करने योग्य हो ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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