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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 14

191 Sukta
15 Mantra
1/121/14
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ अ॒स्या इ॑न्द्र दु॒र्हणा॑याः पा॒हि व॑ज्रिवो दुरि॒ताद॒भीके॑। प्र नो॒ वाजा॑न्र॒थ्यो॒३॒॑अश्व॑बुध्यानि॒षे य॑न्धि॒ श्रव॑से सू॒नृता॑यै ॥

त्वम् । नः॒ । अ॒स्याः । इ॒न्द्र॒ । दुः॒ऽहना॑याः । पा॒हि । व॒ज्रि॒ऽवः॒ । दुः॒ऽइ॒तात् । अ॒भीके॑ । प्र । नः॒ । वाजा॑न् । र॒थ्यः॑ । अश्व॑ऽबुध्यान् । इ॒षे । य॒न्धि॒ । श्रव॑से । सू॒नृता॑यै ॥

Mantra without Swara
त्वं नो अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवो दुरितादभीके। प्र नो वाजान्रथ्यो३अश्वबुध्यानिषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै ॥

त्वम्। नः। अस्याः। इन्द्र। दुःऽहनायाः। पाहि। वज्रिऽवः। दुःऽइतात्। अभीके। प्र। नः। वाजान्। रथ्यः। अश्वऽबुध्यान्। इषे। यन्धि। श्रवसे। सूनृतायै ॥ १.१२१.१४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 26 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(वज्रिवः) जिसकी प्रशंसित विशेष ज्ञानयुक्त नीति विद्यमान सो (इन्द्र) अधर्म का विनाश करनेहारे हे सेनाध्यक्ष ! (रथ्यः) रथ का ले जानेवाला होता हुआ (त्वम्) तूँ (अभीके) संग्राम में (अस्याः) इस प्रत्यक्ष (दुर्हणायाः) दुःख से मारने योग्य शत्रुओं की सेना और (दुरितात्) दुष्ट आचरण से (नः) हम लोगों की (पाहि) रक्षा कर तथा (इषे) इच्छा (श्रवसे) सुनना वा अन्न और (सूनृतायै) उत्तम सत्य तथा प्रिय वाणी के लिये (नः) हम लोगों के (अश्वबुध्यान्) अन्तरिक्ष में हुए अग्नि आदि पदार्थों को चलाने वा बढ़ाने को जो जानते उन्हें और (वाजान्) विशेष ज्ञान वा वेगयुक्त सम्बन्धियों को (प्र, यन्धि) भली-भाँति दे ॥ १४ ॥
Essence
सेनाधीश को चाहिये कि अपनी सेना को शत्रु के मारने से और दुष्ट आचरण से अलग रक्खे तथा वीरों के लिये बल तथा उनकी इच्छा के अनुकूल बल के बढ़ानेवाले पीने योग्य पदार्थ तथा पुष्कल अन्न दे, उनको प्रसन्न और शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीत कर प्रजा की निरन्तर रक्षा करे ॥ १४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।