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Rigveda Mandal 1 / Sukta 121 / Mantra 11

191 Sukta
15 Mantra
1/121/11
Devata- विश्वे देवा इन्द्रश्च Rishi- औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अनु॑ त्वा म॒ही पाज॑सी अच॒क्रे द्यावा॒क्षामा॑ मदतामिन्द्र॒ कर्म॑न्। त्वं वृ॒त्रमा॒शया॑नं सि॒रासु॑ म॒हो वज्रे॑ण सिष्वपो व॒राहु॑म् ॥

अनु॑ । त्वा॒ । म॒ही इति॑ । पाज॑सी॒ इति॑ । अ॒च॒क्रे इति॑ । द्यावा॒क्षामा॑ । म॒द॒ता॒म् । इ॒न्द्र॒ । कर्म॑न् । त्वम् । वृ॒त्रम् । आ॒ऽशया॑नम् । सि॒रासु॑ । म॒हः । वज्रे॑ण । सि॒स्व॒पः॒ । व॒राहु॑म् ॥

Mantra without Swara
अनु त्वा मही पाजसी अचक्रे द्यावाक्षामा मदतामिन्द्र कर्मन्। त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्रेण सिष्वपो वराहुम् ॥

अनु। त्वा। मही इति। पाजसी इति। अचक्रे इति। द्यावाक्षामा। मदताम्। इन्द्र। कर्मन्। त्वम्। वृत्रम्। आऽशयानम्। सिरासु। महः। वज्रेण। सिस्वपः। वराहुम् ॥ १.१२१.११

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 26 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य को पाये हुए सभाध्यक्ष आदि सज्जनपुरुष ! (त्वम्) आप सूर्य जैसे (वृत्रम्) मेघ को छिन्न-भिन्न करे वैसे (सिरासु) बन्धनरूप नाड़ियों में (महः) बड़े (वज्रेण) शस्त्र और अस्त्रों के समूह से (वराहुम्) धर्मयुक्त उत्तम व्यवहार वा धार्मिक जनों के मारनेवाले दुष्ट शत्रु को मारके (आशयानम्) जिसने सब ओर से गाढ़ी नींद पाई उसके समान (सिष्वपः) सुलाओ जिससे (मही) बड़े (पाजसी) रक्षा करनेहारा और अपने प्रकाश करने में (अचक्रे) न रुके हुए (द्यावाक्षामा) सूर्य और (पृथिवी) (त्वा) आपको प्राप्त होकर उनमें से प्रत्येक (कर्मन्) राज्य के काम में तुमको (अनु, मदताम्) अनुकूलता से आनन्द देवें ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि विनय और पराक्रम से दुष्ट शत्रुओं को बाँध, मार और निवार अर्थात् उनको धार्मिक मित्र बना कर समस्त प्रजाजनों को अच्छे कामों में प्रवृत्त करा आनन्दित करें ॥ ११ ॥
Subject
फिर राजा और प्रजा का काम यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।