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Rigveda Mandal 1 / Sukta 120 / Mantra 9

191 Sukta
12 Mantra
1/120/9
Devata- अश्विनौ Rishi- उशिक्पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
दु॒ही॒यन्मि॒त्रधि॑तये यु॒वाकु॑ रा॒ये च॑ नो मिमी॒तं वाज॑वत्यै। इ॒षे च॑ नो मिमीतं धेनु॒मत्यै॑ ॥

दु॒ही॒यन् । मि॒त्रऽधि॑तये । यु॒वाकु॑ । रा॒ये । च॒ । नः॒ । मि॒मी॒तम् । वाज॑ऽवत्यै । इ॒षे । च॒ । नः॒ । मि॒मी॒त॒म् । धेनु॒ऽमत्यै॑ ॥

Mantra without Swara
दुहीयन्मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै। इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै ॥

दुहीयन्। मित्रऽधितये। युवाकु। राये। च। नः। मिमीतम्। वाजऽवत्यै। इषे। च। नः। मिमीतम्। धेनुऽमत्यै ॥ १.१२०.९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 23 Mantra » 4

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Meaning
हे सब विद्याओं में व्याप्त सभासेनाधीशो ! तुम दोनों जो गौयें (दुहीयन्) दूध आदि से पूर्ण करती हैं उनको (नः) हमारे (मित्रधितये) जिससे मित्रों की धारणा हो तथा (युवाकु) सुख से मेल वा दुःख से अलग होना हो उस (राये) धन के (च) और जीवने के लिये (मिमीतम्) मानो तथा (वाजवत्यै) जिसमें प्रशंसित ज्ञान वा (धेनुमत्यै) गौ का संबन्ध विद्यमान है उसके (च) और (इषे) इच्छा के लिये (नः) हमको (मिमीतम्) प्रेरणा देओ अर्थात् पहुँचाओ ॥ ९ ॥
Essence
जो गौ आदि पशु मित्रों की पालना, ज्ञान और धन के कारण हों उनको मनुष्य निरन्तर राखें और सबको पुरुषार्थ के लिये प्रवृत्त करें जिससे सुख का मेल और दुःख से अलग रहें ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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